tumko bhi gar thokar men apni ye zam | तुमको भी गर ठोकर में अपनी ये ज़माना चाहिए

  - Prashant Shakun
तुमकोभीगरठोकरमेंअपनीयेज़मानाचाहिए
अमामियाँकुछतोहुनरतुमकोभीआनाचाहिए
आतेहैंतेरीगलीहररोज़फ़क़तदीदारवास्ते
कभी-कभीतुम्हेंभीमेरीगलीआनाचाहिए
तोहफ़ेमेंमिलागुलाबहाथोंमेंलिएफिरतेहो
इश्क़हैअभीनयानयाइसेअभीछुपानाचाहिए
ख़्वाबोंमेंहीआनामिलनेमुझसेेतुमहरबार
दरमियाँअपनेनहींमुझकोयेज़मानाचाहिए
आशिक़हूँतुम्हारामुझेआवारासमझनातुम
यूँँबेरुख़ीसेइश्क़नहींआज़मानाचाहिए
कितनीहसरतलिएआतेहैंगलीमेंतुम्हारी
तुम्हेंभीतोएकदफ़ादरीचेतकआनाचाहिए
अच्छीलगतीहैअनाशख़्सियतपरतुम्हारी
कुछगुरुरहमेंभीअबख़ुदपरआनाचाहिए
रूठनेकाहक़तुम्हाराहीनहींमेराभीतोहै
मैंजोरूठूँकभीतुम्हेंभीमुझेमनानाचाहिए
  - Prashant Shakun
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