shaq-e-raqs se jab tak ungaliyaan nahin khultin | शौक़-ए-रक़्स से जब तक उँगलियाँ नहीं खुलतीं

  - Parveen Shakir
शौक़-ए-रक़्ससेजबतकउँगलियाँनहींखुलतीं
पाँवसेहवाओंकेबेड़ियाँनहींखुलतीं
पेड़कोदु'आदेकरकटगईबहारोंसे
फूलइतनेबढ़आएखिड़कियाँनहींखुलतीं
फूलबनकेसैरोंमेंऔरकौनशामिलथा
शोख़ी-ए-सबासतोबालियाँनहींखुलतीं
हुस्नकेसमझनेकोउम्रचाहिएजानाँ
दोघड़ीकीचाहतमेंलड़कियाँनहींखुलतीं
कोईमौजा-ए-शीरींचूमकरजगाएगी
सूरजोंकेनेज़ोंसेसीपियाँनहींखुलतीं
माँसेक्याकहेंगीदुखहिज्रकाकिख़ुदपरभी
इतनीछोटी'उम्रोंकीबच्चियाँनहींखुलतीं
शाख़शाख़सरगर्दांकिसकीजुस्तुजूमेंहैं
कौनसेसफ़रमेंहैंतितलियाँनहींखुलतीं
आधीरातकीचुपमेंकिसकीचापउभरतीहै
छतपेकौनआताहैसीढ़ियाँनहींखुलतीं
पानियोंकेचढ़नेतकहालकहसकेंऔरफिर
क्याक़यामतेंगुज़रींबस्तियाँनहींखुलतीं
  - Parveen Shakir
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