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Parveen Shakir
ghazalon ka hunar apni aankhoñ ko sikhaayenge
ghazalon ka hunar apni aankhoñ ko sikhaayenge | ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे
- Parveen Shakir
ग़ज़लों
का
हुनर
अपनी
आँखों
को
सिखाएँगे
रोएँगे
बहुत
लेकिन
आँसू
नहीं
आएँगे
कह
देना
समुंदर
से
हम
ओस
के
मोती
हैं
दरिया
की
तरह
तुझ
से
मिलने
नहीं
आएँगे
वो
धूप
के
छप्पर
हों
या
छाँव
की
दीवारें
अब
जो
भी
उठाएँगे
मिल
जुल
के
उठाएँगे
जब
साथ
न
दे
कोई
आवाज़
हमें
देना
हम
फूल
सही
लेकिन
पत्थर
भी
उठाएँगे
- Parveen Shakir
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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सर
पर
हवा-ए-ज़ुल्म
चले
सौ
जतन
के
साथ
अपनी
कुलाह
कज
है
उसी
बाँकपन
के
साथ
Majrooh Sultanpuri
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मैं
अपनी
हिजरत
का
हाल
लगभग
बता
चुका
था
सभी
को
और
बस
तिरे
मोहल्ले
के
सारे
लड़के
हवा
बनाने
में
लग
गए
थे
Vikram Gaur Vairagi
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अपनी
क़िस्मत
में
सभी
कुछ
था
मगर
फूल
न
थे
तुम
अगर
फूल
न
होते
तो
हमारे
होते
Ashfaq Nasir
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तितली
वो
ही
फूल
चुनेगी
जिस
पर
उसका
दिल
आए
इक
लड़की
के
पीछे
इतनी
मारामारी
ठीक
नहीं
Shubham Seth
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पैर
के
छालों
में
चुभते
हैं
हजारों
काँटें
फूल
तब
बाग
में
शायान
हुआ
करते
हैं
Aves Sayyad
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शब
की
हवा
से
हार
गई
मेरे
दिल
की
आग
यख़-बस्ता
शहर
में
कोई
रद्द-ओ-बदल
न
था
Qaisar-ul-Jafri
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आदतन
उसके
लिए
फूल
ख़रीदे
वरना
नहीं
मालूम
वो
इस
बार
यहाँ
है
कि
नहीं
Abbas Tabish
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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कुछ
तो
हवा
भी
सर्द
थी
कुछ
था
तिरा
ख़याल
भी
दिल
को
ख़ुशी
के
साथ
साथ
होता
रहा
मलाल
भी
Parveen Shakir
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बहुत
रोया
वो
हम
को
याद
कर
के
हमारी
ज़िंदगी
बर्बाद
कर
के
पलट
कर
फिर
यहीं
आ
जाएँगे
हम
वो
देखे
तो
हमें
आज़ाद
कर
के
रिहाई
की
कोई
सूरत
नहीं
है
मगर
हाँ
मिन्नत-ए-सय्याद
कर
के
बदन
मेरा
छुआ
था
उस
ने
लेकिन
गया
है
रूह
को
आबाद
कर
के
हर
आमिर
तूल
देना
चाहता
है
मुक़र्रर
ज़ुल्म
की
मीआ'द
कर
के
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Parveen Shakir
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आधी
रात
की
चुप
में
किस
की
चाप
उभरती
है
छत
पे
कौन
आता
है
सीढ़ियाँ
नहीं
खुलतीं
Parveen Shakir
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लड़कियाँ
बैठी
थीं
पाँव
डालकर
रौशनी
सी
हो
गई
तालाब
में
Parveen Shakir
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अब
भला
छोड़
के
घर
क्या
करते
शाम
के
वक़्त
सफ़र
क्या
करते
तेरी
मसरूफ़ियतें
जानते
हैं
अपने
आने
की
ख़बर
क्या
करते
जब
सितारे
ही
नहीं
मिल
पाए
ले
के
हम
शम्स-ओ-क़मर
क्या
करते
वो
मुसाफ़िर
ही
खुली
धूप
का
था
साए
फैला
के
शजर
क्या
करते
ख़ाक
ही
अव्वल
ओ
आख़िर
ठहरी
कर
के
ज़र्रे
को
गुहर
क्या
करते
राय
पहले
से
बना
ली
तू
ने
दिल
में
अब
हम
तिरे
घर
क्या
करते
इश्क़
ने
सारे
सलीक़े
बख़्शे
हुस्न
से
कस्ब-ए-हुनर
क्या
करते
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Parveen Shakir
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हमने
ही
लौटने
का
इरादा
नहीं
किया
उसने
भी
भूल
जाने
का
वा'दा
नहीं
किया
Parveen Shakir
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