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Parul Singh "Noor"
humeen ne thii sajaai chaak ishq aur khwaab ki
humeen ne thii sajaai chaak ishq aur khwaab ki | हमीं ने थी सजाई चाक इश्क़ और ख़्वाब की
- Parul Singh "Noor"
हमीं
ने
थी
सजाई
चाक
इश्क़
और
ख़्वाब
की
हमीं
पे
आज
लग
गई
है
तोहमत
अज़ाब
की
वो
जीत
कर
भी
इश्क़
में
चला
गया
रुका
नहीं
मैं
हार
कर
हूँ
कर
रही
नुमाइशें
ख़िताब
की
यहाँ
तुम्हारे
जश्न
को
बना
रही
बुलंद
है
कई
घरों
को
खा
गई
है
बोतलें
शराब
की
जवाब
चाहती
थी
जो
वही
फ़क़त
मिला
नहीं
गुलों
में
ख़त्म
हो
चुकी
है
पत्तियाँ
गुलाब
की
- Parul Singh "Noor"
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रास्ता
जब
इश्क़
का
मौजूद
है
फिर
किसी
की
क्यूँँ
इबादत
कीजिए?
ख़ुद-कुशी
करना
बहुत
आसान
है
कुछ
बड़ा
करने
की
हिम्मत
कीजिए
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Bhaskar Shukla
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हुस्न
को
शर्मसार
करना
ही
इश्क़
का
इंतिक़ाम
होता
है
Asrar Ul Haq Majaz
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बख़्शी
हैं
हम
को
इश्क़
ने
वो
जुरअतें
'मजाज़'
डरते
नहीं
सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ
से
हम
Asrar Ul Haq Majaz
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आज
फिर
इज़हार
करते
हैं
सनम
आपसे
ही
प्यार
करते
हैं
सनम
आपको
क्या
इश्क़
से
परहेज़
है
आप
क्यूँ
इनकार
करते
हैं
सनम
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Divy Kamaldhwaj
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यूँँ
कहें
नुमाइशों
के
दिन
क़रीब
आ
गए
महज़
फ़रवरी
हो
किस
तरह
महीना
इश्क़
का
Neeraj Neer
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ज़िन्दगी
से
ऐसे
काटा
सीन
उसने
इश्क़
का
देखता
है
कोई
जैसे
फ़िल्म
गाने
काट
कर
Ankit Maurya
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सताना
रूठ
जाना
और
मनाना
इश्क़
है
लेकिन
अगर
हद
से
ज़ियादा
हो
तो
रिश्ते
टूट
जाते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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इश्क़
से
तबीअत
ने
ज़ीस्त
का
मज़ा
पाया
दर्द
की
दवा
पाई
दर्द-ए-बे-दवा
पाया
Mirza Ghalib
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इश्क़
हो
जाए
किसी
से
कोई
चारा
तो
नहीं
सिर्फ़
मुस्लिम
का
मोहम्मद
पे
इजारा
तो
नहीं
Kunwar Mohinder Singh Bedi Sahar
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देखो
तुम
ने
इश्क़
किया
है
शायर
से
शे'र
कहेगा
ज़ेवर
थोड़ी
ला
देगा
Kumar Kaushal
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आख़िर
में
यूँँ
हुआ
कि
मिरी
मात
हो
गई
मैं
उसके
साथ
थी
जो
ज़माने
के
साथ
था
Parul Singh "Noor"
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सभी
रिश्तें
मैं
यूँँ
बचाए
हूँ
जैसे
तड़पते
दियों
को
हवा
देते
रहना
Parul Singh "Noor"
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मिरी
सगी
मिरी
हयात
ही
नहीं
हुई
तो
ख़ुद-कुशी
की
भी
बिसात
ही
नहीं
हुई
कई
दिनों
से
कोई
शे'र
ही
नहीं
हुआ
कई
दिनों
से
उस
सेे
बात
ही
नहीं
हुई
जो
एक
दिन
मनाने
बैठे
सोग
हिज्र
का
कभी
उस
एक
दिन
की
रात
ही
नहीं
हुई
हमें
भी
इश्क़
खा
गया
तबाह
भी
हुए
ये
ज़्यादती
तुम्हारे
सात
ही
नहीं
हुई
कई
गुज़र
गई
हैं
जिन
में
आना
था
तुम्हें
तुम्हारे
शहर
चाँद
रात
ही
नहीं
हुई
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Parul Singh "Noor"
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आए
मुश्किल
से
उस
रात
का
दिन
अगला
हो
जब
मुलाक़ात
का
दिन
आख़िरी
दिन
गुज़ारा
है
हमने
याद
कर
के
शुरुआत
का
दिन
है
दिवाली
का
दिन
और
ऊपर
आ
गया
बिगड़े
हालात
का
दिन
और
कितनी
सुनूँ
रोज़
तेरी
हो
कभी
तो
मिरी
बात
का
दिन
हिज्र
का
दिन
क़ज़ा
मेरी
था
और
बे-वफ़ा
की
रिवायात
का
दिन
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Parul Singh "Noor"
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हर
दम
नज़र
के
सामने
रक्खे
हैं
मैंने
दोस्त
ख़ंजर
निकाल
ले
ना
कहीं
पीठ
करते
ही
Parul Singh "Noor"
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