khayaal-o-fikr kii sarhad ke paar jaate hue | ख़याल-ओ-फ़िक्र की सरहद के पार जाते हुए

  - Nusrat Siddiqui
ख़याल-ओ-फ़िक्रकीसरहदकेपारजातेहुए
गुरेज़-पाहैकोईख़्वाबमेंभीआतेहुए
किसीनेदेखानहींकौनहैनिशानेपर
किसीनेसोचानहींगोलियाँचलातेहुए
गुज़ारदीहैइन्हींकोशिशोंमेंउम्र-ए-अज़ीज़
कभीसहरकोकभीशामकोमनातेहुए
येसारेहारनेवालेभीमेरेअपनेहैं
कहींमैंरोपड़ूँतालियाँबजातेहुए
जानेकौनसाफ़िर्क़ाख़िलाफ़होजाए
मैंसहमारहताहूँमस्जिदमेंआतेजातेहुए
येफ़र्ज़भीहैयेसुन्नतभीऐसालगताहै
किसीकाबार-ए-अलमदोषपरउठातेहुए
गुज़रनाहोताहैकठिनाइयोंसेबाज़-औक़ात
अलगसेअपनाकोईरास्ताबनातेहुए
हज़ारबारमुझेसोचनापड़ा'नुसरत'
दियाजलातेहुएऔरदियाबुझातेहुए
  - Nusrat Siddiqui
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