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Nityanand Vajpayee
samandar khud bahut hairaan hai nadiyon ki is ulfat se
samandar khud bahut hairaan hai nadiyon ki is ulfat se | समुंदर ख़ुद बहुत हैराँ है नदियों की इस उल्फ़त से
- Nityanand Vajpayee
समुंदर
ख़ुद
बहुत
हैराँ
है
नदियों
की
इस
उल्फ़त
से
ये
इतना
डूब
के
मिलतीं
कि
फिर
ढूँढे
नहीं
मिलतीं
- Nityanand Vajpayee
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नाम
लिख
लिख
के
तिरा
फूल
बनाने
वाला
आज
फिर
शबनमीं
आँखों
से
वरक़
धोता
है
Ghulam Mohammad Qasir
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रखते
हैं
मोबाइल
में
मोहब्बत
की
निशानी
अब
फूल
किताबों
में
छुपाया
नहीं
करते
Meharban Amrohvi
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मैं
जिसे
ओढ़ता
बिछाता
हूँ
वो
ग़ज़ल
आप
को
सुनाता
हूँ
एक
जंगल
है
तेरी
आँखों
में
मैं
जहाँ
राह
भूल
जाता
हूँ
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Dushyant Kumar
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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इसे
तो
वक़्त
की
आब-ओ-हवा
ही
ठीक
कर
देगी
मियाँ
नासूर
होते
ज़ख़्म
सहलाया
नहीं
करते
shaan manral
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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मैं
अपनी
हिजरत
का
हाल
लगभग
बता
चुका
था
सभी
को
और
बस
तिरे
मोहल्ले
के
सारे
लड़के
हवा
बनाने
में
लग
गए
थे
Vikram Gaur Vairagi
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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क़ैस
जंगल
में
अकेला
है
मुझे
जाने
दो
ख़ूब
गुज़रेगी
जो
मिल
बैठेंगे
दीवाने
दो
Miyan Dad Khan Sayyah
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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सभी
कुछ
छीन
लो
मुझ
सेे
ये
मेरा
दर्द
मत
छीनो
कसक
के
बिन
मेरी
ये
शा'इरी
मर
जाएगी
तन्हा
Nityanand Vajpayee
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बंदा
है
नेक
तू
तो
मशक़्क़त
से
कुछ
कमा
मेहनत
बिना
मिले
जो
वो
दौलत
हराम
है
Nityanand Vajpayee
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शिकस्त-याब
को
तमगा
इसे
मैं
क्या
समझूँ
अजीब-तर
है
ये
कुनबा
इसे
मैं
क्या
समझूँ
मियाँ
दिमाग़
में
क्या
कुछ
है
केमिकल
लोचा
शिकस्त-ए-फ़ाश
पे
जलसा
इसे
मैं
क्या
समझूँ
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Nityanand Vajpayee
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ज़रा
सी
बात
को
पकडेंगे
फिर
तुमको
डराएँगे
सियासत-दान
हैं
ये
लोग
बस
नीचा
दिखाएँगे
ये
ख़ुद
तो
देश
की
अस्मत
तलक
को
बेच
देंगे
पर
हमें
यह
देश
पर
क़ुर्बान
हो
जाना
सिखाएँगे
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Nityanand Vajpayee
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मेरी
आस्तीन
में
जो
पलते
हैं
साँप
बनके
ही
क्यूँ
निकलते
हैं
मैं
ने
सबकुछ
लुटा
दिया
जिनको
मेरी
ख़ातिर
वो
विष
उगलते
हैं
इल्म
बेशक़
न
रंच
भर
जिनको
सब
सेे
ज़्यादा
वही
उछलते
हैं
ख़ुदस
ज़्यादा
यक़ीन
था
जिनपे
पाँव
मेरा
वही
कुचलते
हैं
छोड़ा
जिनको
था
केंचुआ
कहकर
अब
वो
अज़गर
बने
टहलते
हैं
मेरे
उपवन
में
ही
उगे
थे
वो
'नित्य'
काँटे
मुझे
जो
खलते
हैं
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Nityanand Vajpayee
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