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Nityanand Vajpayee
mujh pe ungli utha rahe ho tum
mujh pe ungli utha rahe ho tum | मुझ पे उँगली उठा रहे हो तुम
- Nityanand Vajpayee
मुझ
पे
उँगली
उठा
रहे
हो
तुम
सच
को
झूठा
बना
रहे
हो
तुम
साफ़-गोई
से
झूठे
जुमले
फेंक
मन
ही
मन
मुस्कुरा
रहे
हो
तुम
कर
के
शिकवे
गिले
सभी
से
यहाँ
कैसी
साज़िश
रचा
रहे
हो
तुम
तुम
में
रेज़ा
तलक
न
सच
का
है
फिर
भला
क्या
दिखा
रहे
हो
तुम
मुझ
में
मैं
अब
बचा
ही
कितना
हूँ
नित्य
बस
टिमटिमा
रहे
हो
तुम
- Nityanand Vajpayee
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तुम्हें
पसंद
नहीं
हूँ
तो
एक
काम
करूँँ
पढ़ा
दूँ
अफ़सरी
फिर
तुम
तलाक़
ले
लेना
Nityanand Vajpayee
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वो
जब
से
दिल
में
उतर
गए
हैं
हम
और
भी
कुछ
सँवर
गए
हैं
मिज़ाज
में
है
अजीब
शोख़ी
उसी
में
खो
कर
बिखर
गए
हैं
कली
हज़ारों
हैं
गुलशनों
में
मगर
उन्हीं
पर
ठहर
गए
हैं
पढ़ा
उन्होंने
ख़याल
मेरा
तो
खिल
के
कितना
निखर
गए
हैं
गुलाब
की
पंखुड़ी
मुकम्मल
पे
उनके
कमसिन
अधर
गए
हैं
वहीं
हैं
अब
तक
जहाँ
मिले
थे
इधर
रुके
हैं
उधर
गए
हैं
है
नित्य
उनका
इलाज
ही
क्या
जो
मर
गए
या
मुकर
गए
हैं
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Nityanand Vajpayee
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ऋतु
शरद
कितनी
सुहानी
भा
रही
हर
जवाँ
दिल
की
रज़ा
हुलसा
रही
गर्मियों
से
ऊबकर
भागी
ख़िज़ाँ
लू
गई
ठण्डी
हवा
हरषा
रही
अब
उमस
बरसात
की
भी
खो
गई
कंबलों
की
रोशनाई
गा
रही
शम्स
ने
भी
नर्म
कुछ
कर
दी
अदा
और
कुब्बत
धूप
की
शरमा
रही
अब
अलावों
के
किनारे
बैठ
कर
शेख़चिल्ली
की
कहानी
छा
रही
भूलकर
शिकवे
गिले
अब
गाँव
में
खिलखिलाहट
धूप
में
इठला
रही
सर्दियों
में
गुनगुना
सा
ले
बदन
नेह
पाने
सरि
जलधि
को
जा
रही
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Nityanand Vajpayee
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रोटी
की
ख़ातिर
दोनों
ने
श्वेद
बहाएा
फिर
दोनों
ने
काम
पड़ा
जब
आज
तुम्हारा
दर्द
सहा
आख़िर
दोनों
ने
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Nityanand Vajpayee
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जीते
जी
मर
जाना
कोई
खेल
नहीं
उन
सेे
इश्क़
लड़ाना
कोई
खेल
नहीं
Nityanand Vajpayee
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