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Naviii dar b dar
kyuuñ sirf ek din men hi ab rahe simat kar
kyuuñ sirf ek din men hi ab rahe simat kar | क्यूँ सिर्फ़ एक दिन में ही अब रहे सिमट कर
- Naviii dar b dar
क्यूँ
सिर्फ़
एक
दिन
में
ही
अब
रहे
सिमट
कर
माँ
के
लिए
तो
हर
दिन
ही
ख़ास
होता
है
जब
- Naviii dar b dar
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सफ़र
में
हम
सेफ़र
की
मेज़बानी
किसके
हाथों
में
शुरू
होने
से
पहले
की
कहानी
किसके
हाथों
में
अभी
तो
है
ये
बस
आभास
के
पल
भर
में
हो
जाए
है
खोए
उस
बशर
की
आँ-जहानी
किसके
हाथों
में
मुक़द्दर
भी
किसी
का
साथ
देता
यूँँ
भला
कब
है
ये
होते
हर
करम
बस
ना-गहानी
किसके
हाथों
में
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फॅंसाकर
के
मुझको
हमेशा
तो
ख़ुश
रहती
है
वो
परेशानी
भी
दोस्ती
अच्छे
से
है
निभाती
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उन
इश्क़
के
भी
हारों
को
हारा
नहीं
मिला
हम
जैसे
आशिक़ों
को
किनारा
नहीं
मिला
यूँँ
प्यार
की
तो
उम्र
भर
उम्मीद
थी
हमें
फिर
भी
किसी
से
इश्क़
दोबारा
नहीं
मिला
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प्रेम
में
भटका
हुआ
हूँ
आज-कल
हर
तरफ़
लटका
हुआ
हूँ
आज-कल
कोई
जब
से
आया
है
जीवन
में
यूँँ
तब
से
ही
अटका
हुआ
हूँ
आज-कल
मुझको
मेरी
हैसियत
भी
है
पता
दर्द
में
खटका
हुआ
हूँ
आज-कल
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मुझपर
ये
मेरे
ही
बड़ों
की
तर्बियत
का
है
असर
मैं
दिल
दुखाने
वाले
के
भी
दिल
में
घर
कर
लेता
हूँ
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