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Naviii dar b dar
gareebi ko bhi tum aamaal par chhodo
gareebi ko bhi tum aamaal par chhodo | गरीबी को भी तुम आमाल पर छोड़ो
- Naviii dar b dar
गरीबी
को
भी
तुम
आमाल
पर
छोड़ो
ये
हर
दिन
अब
यूँँ
ही
हर
साल
पर
छोड़ो
नहीं
सुध
लेनी
जब
यारों
किसी
को
भी
मुझे
ऐसे
ही
मेरे
हाल
पर
छोड़ो
- Naviii dar b dar
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वो
अलग
किरदार
में
दिखता
है
अब
आदमी
क्यूँ
हार
में
दिखता
है
अब
देखकर
दुख
होता
है
दिल
को
मेरे
झूठ
हर
अख़बार
में
दिखता
है
अब
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इश्क़
का
बुख़ार
कब
तलक
वो
हसीं
यूँँ
प्यार
कब
तलक
कोई
हो
ग़मों
को
बाँटे
जो
हम
ही
बेक़रार
कब
तलक
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कल
भी
रोटी
कहाँ
से
आएगी
एक
बस
इस
जुगत
में
रहता
दिल
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सब
यहाँ
पर
अदाकार
लगते
मुझे
जो
मुहब्बत
के
बीमार
लगते
मुझे
सारी
दुनिया
जो
भूले
बस
इक
प्यार
में
ऐसे
भटके
ये
बेज़ार
लगते
मुझे
छोड़कर
बाप
माँ
को
जो
ख़ुश
हैं
यहाँ
ऐसे
जाहिल
तो
बेकार
लगते
मुझे
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उन
इश्क़
के
भी
हारों
को
हारा
नहीं
मिला
हम
जैसे
आशिक़ों
को
किनारा
नहीं
मिला
यूँँ
प्यार
की
तो
उम्र
भर
उम्मीद
थी
हमें
फिर
भी
किसी
से
इश्क़
दोबारा
नहीं
मिला
जब
वक़्त
यूँँ
ही
बीता
तो
इंसाॅं
बदल
गए
उन
जैसे
जाहिलों
को
ख़सारा
नहीं
मिला
221
2121
1221
212
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