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Naved sahil
iske ghar men nahin ab hai aataa KHuda
iske ghar men nahin ab hai aataa KHuda | इसके घर में नहीं अब है आटा ख़ुदा
- Naved sahil
इसके
घर
में
नहीं
अब
है
आटा
ख़ुदा
इसकी
रोटी
जलाना,
ग़लत
बात
है
- Naved sahil
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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सज़ा
कितनी
बड़ी
है
गाँव
से
बाहर
निकलने
की
मैं
मिट्टी
गूँधता
था
अब
डबलरोटी
बनाता
हूँ
Munawwar Rana
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लो
चाँद
हो
गया
नमू
माह-ए-ख़राम
का
ऐ
मोमिनों
लिबास-ए-सियाह
ज़ेब-ए-तन
करो
फ़र्श-ए-अज़ा
बिछा
के
अज़ाख़ाने
में
शजर
अब
सुब्ह-ओ-शाम
ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन
करो
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Shajar Abbas
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भूख
है
तो
सब्र
कर,
रोटी
नहीं
तो
क्या
हुआ
आजकल
दिल्ली
में
है
ज़ेर-ए-बहस
ये
मुद्दआ
Dushyant Kumar
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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दो
दफ़ा
ग़ुस्सा
हुए
वो
एक
ग़लती
पर
मेरी
रात
की
रोटी
सवेरे
काम
में
लाई
गई
Tanoj Dadhich
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ये
टूटी
चटाई
ये
मिटटी
का
बर्तन
हिकारत
से
नादान
क्या
देखता
है
गरीबी
मोहम्मद
के
घर
में
पली
है
मेरे
घर
का
सामान
क्या
देखता
है
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Anjuman rahi raza
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जन्मदिन
पर
भी
मुझे
वो
याद
अब
करता
नहीं
इस
ज़माने
में
कोई
इतना
भी
मुफ़्लिस
होगा
क्या
Harsh saxena
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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मौत
आए
न
रब
कहीं
मुझको
नींद
आती
ही
अब
नहीं
मुझको
तुम
भी
इस
मोड़
पे
ले
आई
नछोड़
जाते
है
सब
यहीं
मुझको
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Naved sahil
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कुछ
तो
बात
हुई
है
साहिल
बात
अधूरी
क्यूँँ
करते
हो
Naved sahil
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वस्ल-ए-दूरी
क्यूँँ
करते
हो
है
मजबूरी?
क्यूँँ
करते
हो
खोले
बाल
ये
कॉलिज
आना
है
कमज़ोरी
क्यूँँ
करते
हो
ग़ुस्से
में
वो
ये
बोली
मुझ
सेे
सुन
ओ
छोरी
क्यूँँ
करते
हो
बेआशिक
हो
रहो
ना
वैसे
सुख
से
दूरी
क्यूँँ
करते
हो
कुछ
तो
बात
हुई
है
साहिल
बात
अधूरी
क्यूँँ
करते
हो
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Naved sahil
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सज
सँवर
के
सामने
जो
तुम
हमारे
आ
गए
यूँँ
लगा
की
इस
ज़मीं
पे
सब
सितारे
आ
गए
कश्ती
मेरी
डूब
कर
भी
इक
नसीहत
दे
गई
उस
नसीहत
के
सहारे
हम
किनारे
आ
गए
नेट
की
दुनिया
में
हम
तो
शा'इरी
ले
आए
थे
वो
अजूबे
हो
गए
जो
तन
उघारे
आ
गए
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Naved sahil
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वक़्त
पे
यूँँ
न
आना,
ग़लत
बात
है
फिर
बहाने
से
जाना,
ग़लत
बात
है
आधी
रातों
में
हम
किसको
आवाज़
दें
नींद
से
यूँँ
जगाना,
ग़लत
बात
है
नफ़रतों
से
भरी
जैसी
दुनिया
है
ये
इस
में
उल्फ़त
निभाना,
ग़लत
बात
है
जिनका
घर
में
कोई
और
साथी
ना
हो
उसका
दीपक
बुझाना,
ग़लत
बात
है
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Naved sahil
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