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nakul kumar
ruk gaya dariyaa samundar bah gaya
ruk gaya dariyaa samundar bah gaya | रुक गया दरिया समुन्दर बह गया
- nakul kumar
रुक
गया
दरिया
समुन्दर
बह
गया
और
फिर
आख़िर
हिमालय
ढह
गया
एक
मैं
रिश्ता
जिसे
जीने
चला
ख़्वाब
था
जो
ख़्वाब
बनकर
रह
गया
ये
ज़रूरी
था
कि
मेरी
मात
हो
मैं
इसे
अपना
मुक़द्दर
कह
गया
चाँदनी
का
साथ
केवल
रात
भर
मैं
तेरा
जाना
भी
जानाँ
सह
गया
दर्द
का
दरिया
रुका
पलकों
तलक
एक
दिन
फिर
अश्क
बनकर
बह
गया
- nakul kumar
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इस
में
मारे
जाएँगे
सब
हाशिए
के
लोग
ही
जंगली
कानून
जो
लागू
है
पूँजीवाद
में
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nakul kumar
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अश्कों
से
बुझाकर
आया
हूँ
जो
आग
लगी
है
झरने
में
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हम
किसी
को
राह
में
कुछ
देर
भी
तक
लें
अगर
पागलों
को
जो
मिले
तो
सब
के
सब
पागल
मिले
nakul kumar
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जिसकी
ख़ातिर
शे'र
लिखे
हैं
अश्क
भरे
पैमानों
से
उस
लड़की
का
नाम
ग़ज़ल
है
शे'र
नहीं
कह
पाती
है
कोई
तो
समझाओ
उसको
दिल
मेरा
वीराना
है
वो
लड़की
जो
ख़्वाब
में
अक्सर
आती
है
रह
जाती
है
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nakul kumar
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दर
दीवारें
गुमसुम
हैं
छत
भारी-भारी
है
मेरा
कमरा
भी
जैसे
मेरे
दर्द
सरीखा
है
nakul kumar
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