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nakul kumar
na badla hai kuchh bhi kisi haal men
na badla hai kuchh bhi kisi haal men | न बदला है कुछ भी किसी हाल में
- nakul kumar
न
बदला
है
कुछ
भी
किसी
हाल
में
वही
हैं
मसाइल
नए
साल
में
ज़रा
ग़ौर
से
अब
मुझे
देखिए
वही
एक
बन्दा
ख़द-ओ-ख़ाल
में
कभी
तो
रिहाई
इन्हें
भी
मिले
जो
कब
से
फँसे
हैं
किसी
जाल
में
इन्हें
ग़म
लगा
है
गए
साल
का
जो
रोने
लगे
हैं
यूँँ
सुर-ताल
में
नहीं
कुछ
मिलेगा
मिरी
ज़ात
में
न
ज़ाहिद
मिलेगा
बद-आमाल
में
है
मेरी
कहानी
यहीं
तक
अभी
परिंदा
समाया
पर-ओ-बाल
में
मुहब्बत
का
कीड़ा
भी
मर
जाएगा
ज़रा
ख़ुद
को
रखिए
मिरे
हाल
में
- nakul kumar
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बो
देता
है
ख़्वाहिश
फिर
रोता
है
सातों
दिन
अपना
मन
ही
हर
ग़म
का
गहवारा
होता
है
nakul kumar
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पीपल
बरगद
नीम
यहाँ
पर
छाँव
ढूॅंढ़ने
आते
हैं
बूढ़े
होते
नगर
यहाँ
पर
गाँव
ढूॅंढ़ने
आते
हैं
चलते-चलते
थकने
वाले
लोग
यहाँ
पर
आख़िर
में
मेरे
इन
क़दमों
में
अपने
पाँव
ढूॅंढ़ने
आते
हैं
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ख़ुशियों
का
तो
आना
जाना
लगा
रहेगा
पर
ग़म
का
दिल
में
रह
जाना
हमवारा
होता
है
nakul kumar
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इन्हीं
पिछले
दिनों
से
कुछ
मुझे
इस
बात
का
ग़म
है
अगर
मैं
रो
रहा
हूँ
तो
तिरी
क्यूँँ
आँख
पुर-नम
है
तिरी
तस्वीर
है
ये
रात
है
बारिश
है
बादल
भी
मगर
फिर
भी
न
जाने
क्यूँँ
यहाँ
कुछ
तो
अभी
कम
है
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nakul kumar
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ख़ुद
ही
ख़ुदस
कट
गया
है
बे-सहारा
आदमी
चल
रही
है
लाश
लेकिन
मर
चुके
एहसास
हैं
nakul kumar
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