mat kaho koii mujhe kya KHaak kar paaya hooñ main | मत कहो कोई मुझे क्या ख़ाक कर पाया हूँ मैं

  - nakul kumar
मतकहोकोईमुझेक्याख़ाककरपायाहूँमैं
ख़ाककरनेकोनहींइसदुनियामेंआयाहूँमैं
मेरीपलकोंकेतलेअबख़्वाबलाखोंदफ़्नहैं
आजफिरकहताहूँयेमनहूसइकसायाहूँमैं
इकअधूरागीतथामैंकलतलकजिनकेबिना
वोबहारेंआजपीछेछोड़करआयाहूँमैं
इतनीक्यूँबेचैनहैतूइसघनेरीरातमें
लेमुझेअबदेखलेअबचाँदबनआयाहूँमैं
छानेकोतोआजतकछप्परनहींछायाकभी
बादलोंकेगाँवपरबादलबनाछायाहूँमैं
चाहथीबनजाऊँगामैंभीबहार-ए-ज़िंदगी
काँटाबनकेरहगयागुलभीबनपायाहूँमैं
मौतमुझकोभीजगहदेअपनेआँचलमेंकहीं
ज़िंदगीकीगोदमेंकुछटूटकरआयाहूँमैं
मेरेअपनेकरतेहैंकुछक़द्रमेरीइसक़दर
जैसेइनकोराहमेंसिक्कापड़ापायाहूँमैं
मैंनेतोमानायहीइंसानियतबिकतीनहीं
औरफिरबाज़ारमेंख़ुदकोखड़ापायाहूँमैं
मेरेमुँहकोताकतेहैंलोगभीकुछइसतरह
इनकेहिस्सेकानिवालाभीकभीखायाहूँमैं
  - nakul kumar
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