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nakul kumar
koii na milega angane men
koii na milega angane men | कोई न मिलेगा अँगने में
- nakul kumar
कोई
न
मिलेगा
अँगने
में
सब
अपने-अपने
कमरे
में
गुल
जान
गँवा
बैठा
अपनी
इन
तस्वीरों
को
रँगने
में
मैं
सैर-सपाटा
करता
हूँ
कुछ
वक़्त
बिताकर
कमरे
में
जब
याद
तुझे
कर
लेता
हूँ
मन
लगता
नहीं
है
मरने
में
अश्कों
से
बुझाकर
आया
हूँ
जो
आग
लगी
है
झरने
में
ये
सोच
मुहब्बत
कर
बैठे
कुछ
आसानी
हो
मरने
में
दो
क़ातिल
देखे
फूलों
ने
इक
माली
में
इक
भँवरे
में
नुक़्सान
बहुत
है
अपना
भी
जलने
से
पहले
बुझने
में
- nakul kumar
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पर्वतों
को
ज़ख़्म
गहरे
दे
दिए
हैं
पानियों
से
पत्थरों
पर
वार
कर
के
nakul kumar
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ख़ुशियों
का
तो
आना
जाना
लगा
रहेगा
पर
ग़म
का
दिल
में
रह
जाना
हमवारा
होता
है
nakul kumar
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जी
भर
गया
है
अब
तो
जी
भर
चाहने
वालों
से
भाग
रहा
हूँ
मैं
भी
मुझ
सेे
भागने
वालों
से
nakul kumar
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मुझे
मिलने
को
आई
है
बड़े
दिन
बाद
बेचारी
हॅंसी
है
खिल
खिलाई
है
बड़े
दिन
बाद
बेचारी
मेरी
बंजर
ज़मीं
पे
वो
बनी
सरसों
सुनहरी
सी
भरी
पूरी
उग
आई
है
बड़े
दिन
बाद
बेचारी
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nakul kumar
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तुम
जैसे
ना-मुराद
की
सुनता
रहा
है
वो
जिसने
नहीं
सुनी
कभी
अपनी
भी
आज
तक
nakul kumar
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