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Naeem Zarrar Ahmad
saamne apne tu bula ke to dekh
saamne apne tu bula ke to dekh | सामने अपने तू बुला के तो देख
- Naeem Zarrar Ahmad
सामने
अपने
तू
बुला
के
तो
देख
हौसला
मेरा
आज़मा
के
तो
देख
मह-ए-कामिल
भी
मांद
पड़
जाए
अपना
चेहरा
उसे
दिखा
के
तो
देख
आज
क़ौस-ए-क़ुज़ह
का
लुत्फ़
कहाँ
अपने
आरिज़
पे
रंग
हया
के
तो
देख
मैं
तिरी
आख़िरी
ज़रूरत
हूँ
तू
कभी
मुझ
से
दूर
जा
के
तो
देख
जाँ-ब-लब
हूँ
क़रार
आ
जाए
अपनी
पलकें
ज़रा
उठा
के
तो
देख
हैं
दु'आओं
से
मो'जिज़े
मुमकिन
तू
ख़ुदा
को
कभी
मना
के
तो
देख
- Naeem Zarrar Ahmad
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सोचकर
अब
शर्म
आती
है
ज़रा
चूम
लेना
होंठ
को
इज़हार
में
Neeraj Neer
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लिपट
भी
जा
न
रुक
'अकबर'
ग़ज़ब
की
ब्यूटी
है
नहीं
नहीं
पे
न
जा
ये
हया
की
ड्यूटी
है
Akbar Allahabadi
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जवाँ
होने
लगे
जब
वो
तो
हम
से
कर
लिया
पर्दा
हया
यक-लख़्त
आई
और
शबाब
आहिस्ता
आहिस्ता
Ameer Minai
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मुँह
फेर
कर
वो
कहते
हैं
बस
मान
जाइए
इस
शर्म
इस
लिहाज़
के
क़ुर्बान
जाइए
Bekhud Dehelvi
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पहले
तो
मेरी
याद
से
आई
हया
उन्हें
फिर
आइने
में
चूम
लिया
अपने-आप
को
Shakeb Jalali
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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मोहब्बत
के
इक़रार
से
शर्म
कब
तक
कभी
सामना
हो
तो
मजबूर
कर
दूँ
Akhtar Shirani
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कोर्ट
में
तारीख़
के
ये
सिलसिले
चलते
रहे
और
वो
लड़की
वहाँँ
पर
शर्म
से
ही
मर
गई
Sunny Seher
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हम
तो
उस
आँख
के
हैं
देखने
वाले,
देखो
जिस
में
शोख़ी
है
बहुत
और
हया
थोड़ी
सी
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Dagh Dehlvi
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लजा
कर
शर्म
खा
कर
मुस्कुरा
कर
दिया
बोसा
मगर
मुँह
को
बना
कर
Unknown
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हो
गए
हम
शिकार
फूलों
के
हैं
ग़ज़ब
इख़्तियार
फूलों
के
मेरी
तन्हाइयाँ
बताती
हैं
फूल
होते
हैं
यार
फूलों
के
एक
मंज़िल
है
मुख़्तलिफ़
राहें
रंग
हैं
बे-शुमार
फूलों
के
आज
फूलों
के
आलमी
दिन
पर
उस
ने
भेजे
हैं
ख़ार
फूलों
के
फूल
हैं
शे'र
बू-ए-गुल
धुन
है
हम
हैं
नग़्मा-निगार
फूलों
के
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Naeem Zarrar Ahmad
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तेरी
आँखों
के
दो
सितारे
थे
जिन
पे
हम
दो
जहान
हारे
थे
सारी
ता'रीफ़
थी
उसे
ज़ेबा
जितने
बोहतान
थे
हमारे
थे
जितनी
आँखें
थीं
सारी
मेरी
थीं
जितने
मंज़र
थे
सब
तुम्हारे
थे
दिन
वही
उम्र
भर
का
हासिल
हैं
जो
तिरी
याद
में
गुज़ारे
थे
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Naeem Zarrar Ahmad
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वक़्त
का
सिलसिला
नहीं
रुकता
लाख
रोको
ज़रा
नहीं
रुकता
ये
ज़मीं
है
ख़ुदाओं
का
मदफ़न
आदम-ए-कज-अदा
नहीं
रुकता
इश्क़
वो
चार
सू
सफ़र
है
जहाँ
कोई
भी
रास्ता
नहीं
रुकता
रफ़्तगाँ
आईना
दिखाता
है
कुछ
भी
हो
इर्तिक़ा
नहीं
रुकता
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Naeem Zarrar Ahmad
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घड़ी
जीता
घड़ी
मरता
रहा
हूँ
उसे
जाते
हुए
तकता
रहा
हूँ
मैं
ख़ुद
को
सामने
तेरे
बिठा
कर
ख़ुद
अपने
से
गिला
करता
रहा
हूँ
जो
सारे
शहर
का
था
उस
की
ख़ातिर
मैं
सारे
शहरस
लड़ता
रहा
हूँ
मैं
वक़्त-ए-ख़ाना-ए-मज़दूर
था
सो
ब-तौर-ए-इम्तिहाँ
कटता
रहा
हूँ
बहुत
पहचानता
हूँ
ज़ाहिदों
को
तुम्हारे
घर
का
मैं
रस्ता
रहा
हूँ
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Naeem Zarrar Ahmad
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बिखरा
है
कई
बार
समेटा
है
कई
बार
ये
दिल
तिरे
अतराफ़
को
निकला
है
कई
बार
जिस
चाँद
के
दीदार
की
हसरत
में
है
दुनिया
वो
शाम
ढले
घर
मिरे
उतरा
है
कई
बार
सुन
कर
तुझे
मदहोश
ज़माना
है
मुझे
देख
जिस
ने
तिरी
आवाज़
को
देखा
है
कई
बार
अफ़्सोस
कि
है
इश्क़-ए-यगाना
से
बहुत
दूर
यारो
तुम्हें
हर
रोज़
जो
होता
है
कई
बार
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Naeem Zarrar Ahmad
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