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Ankur Mishra
ye labon se jo may ko lag
ye labon se jo may ko lag | ये लबों से जो मय को लगाए हुए हैं सनम
- Ankur Mishra
ये
लबों
से
जो
मय
को
लगाए
हुए
हैं
सनम
हाँ
तिरी
तिश्नगी
के
सताए
हुए
हैं
सनम
रह
न
जाए
खड़ी
ये
मोहब्बत
कहीं
सर-ब-सर
सोचते
हैं
फ़लक
से
जो
आए
हुए
हैं
सनम
छोड़
दो
ज़िंदगी
का
भरम
ज़िंदगी
के
लिए
और
भी
फूल
शाखों
पे
आए
हुए
हैं
सनम
आज़माते
हैं
यादों
को
तेरी
सबब
ख़ुद
के
हम
ज़ख़्म
से
ज़ख़्म
हाँ
हम
भी
खाए
हुए
हैं
सनम
- Ankur Mishra
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दर-ब-दर
बेज़ार
सा
था
ख़ाली
मैं
इतवार
सा
था
भर
गए
थे
ज़ख़्म
लेकिन
फिर
भी
मैं
बीमार
सा
था
जाने
किसकी
थी
ये
साज़िश
कौन
वो
अय्यार
सा
था
पास
सब
था
मेरे
पर
मैं
लगता
क्यूँ
अशरार
सा
था
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हमने
ख़ुद
से
भी
उल्फ़त
नहीं
की
बाद
उसके
मोहब्बत
नहीं
की
मर
गया
मुझ
में
मैं
पर
किसी
ने
उस
सेे
कोई
शिकायत
नहीं
की
छोड़
दूँ
कैसे
मैं
आदत
उसकी
जिसकी
हमनें
हिफ़ाज़त
नहीं
की
ख़ुद
न
दुश्मन
हो
जाएँ
ख़ुदी
के
इसलिए
बस
बग़ावत
नहीं
की
मैं
हूँ
वाक़िफ़
ज़माने
से
अंकुर
इसलिए
कोई
चाहत
नहीं
की
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ख़ुदगर्ज़ी
के
इस
काम
से
वाक़िफ़
हूँ
अपने
नाम
से
रहने
दो
तन्हा
ही
मुझे
डरता
हूँ
सुब्ह-ओ-शाम
से
हैं
बे-ख़बर
ख़ुद
अब
तलक़
वो
हसरत-ए-अंजाम
से
शायद
यक़ीं
आए
उसे
इस
आख़िरी
पैग़ाम
से
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बंद
खिड़की
से
ख़ाली
मकाँ
देखते
हैं
मियाँ
इस
धुएँ
में
वो
ख़ाली
धुआँ
देखते
हैं
मियाँ
सम्त
बैठे
हैं
वो
आइने
के
मगर
जा-ब-जा
हम
सदाओं
के
भीगे
निशाँ
देखते
हैं
मियाँ
बाद
भरने
के
ज़ख़्मों
के
ऐ
हम-नशीं
सर-ब-सर
दिल
पे
मरहम
के
गहरे
निशाँ
देखते
हैं
मियाँ
बे-ख़बर
हैं
वो
अपने
ही
साए
से
लेकिन
सभी
आइने
के
उसे
दरमियाँ
देखते
हैं
मियाँ
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दर्द
को
दिल
के
सहारे
छोड़
जाता
है
दरमियाॅं
ख़ुद
को
हमारे
छोड़
जाता
है
हू-ब-हू
है
शख़्सियत
उस
सी
हमारी
जो
तख़्तियों
पे
रंग
सारे
छोड़
जाता
है
सोचते
हैं
देखकर
हर
शब
यही
अक्सर
कौन
रिंदों
को
किनारे
छोड़
जाता
है
आसमाॅं
से
नाप
लेता
हैं
ज़मीं
अपनी
गर्द
में
अंकुर
सितारे
छोड़
जाता
है
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