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Ankur Mishra
subah se shaam ho jaati hai
subah se shaam ho jaati hai | सुब्ह से शाम हो जाती है
- Ankur Mishra
सुब्ह
से
शाम
हो
जाती
है
ज़िंदगी
आम
हो
जाती
है
सोचूँ
जब
भी
उसे
मैं
कभी
रात
बदनाम
हो
जाती
है
कैसे
उस
सेे
वफ़ा
मैं
करूँँ
प्यास
ये
ताम
हो
जाती
है
मुझ
सेे
मत
पूछो
हालत
मेरी
लड़की
बदनाम
हो
जाती
है
- Ankur Mishra
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ख़ुद
से
वहशत
सी
होने
लगी
है
रात
पलकें
भिगोने
लगी
है
पूछती
हैं
पता
तेरा
यादें
नींद
काँटे
चुभोने
लगी
है
भर
गए
ज़ख़्म
आख़िर
पुराने
सहरा
दरिया
डुबोने
लगी
है
नम
हैं
आखें
मिरी
जाने
क्यूँ
ये
क्या
किसी
की
वो
होने
लगी
है
माना
आदत
बुरी
है
ये
लेकिन
ज़िंदगी
ख़्वाब
बोने
लगी
है
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बे-ख़बर
है
कौन
तीर-ए-नाज़
से
हैं
सभी
वाक़िफ़
अँधेरी
शाज़
से
जानता
हूँ
मैं
पता
मेरा
मगर
इश्क़
है
मुझको
दयार-ए-नाज़
से
साथ
चल
पर
ऐ
मुसाफ़िर
जान
ले
बे-ख़बर
हैं
पाँव
ये
अफ़राज़
से
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देख
हँसता
मुझे
ज़िंदगी
पर
रो
पड़ा
आइना
बेबसी
पर
साथ
रहता
था
मेरे
कभी
वो
पास
उसके
है
ग़म
वो
अभी
पर
दोस्त
दुश्मन
सभी
याद
आए
याद
आया
न
मुझको
मैं
ही
पर
जान
लेती
नहीं
मौत
भी
अब
है
यक़ीं
इस
क़दर
ज़िंदगी
पर
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यूँँ
तो
हर
इक
गुज़रती
शाम
से
है
मुझे
मतलब
मगर
बस
जाम
से
है
हुआ
क्या
जो
कोई
मेरा
नहीं
पर
गिला
मुझको
मिरे
बस
नाम
से
है
तमन्ना
अब
नहीं
जीने
की
मुझको
न
डर
मुझको
किसी
इल्ज़ाम
से
है
मोहब्बत
ने
किसे
है
छोड़ा
ज़िंदा
यहाँ
किसको
गिला
अब
जाम
से
है
तिरी
ख़ातिर
ही
हूँ
मैं
ज़िंदा
वर्ना
मुझे
नफ़रत
मोहब्बत
नाम
से
है
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चंद
क़तरों
से
गुज़ारा
कर
लिया
हमने
दरिया
से
किनारा
कर
लिया
करने
आई
तब
तकाज़ा
ज़िंदगी
मौत
ने
जब
काम
सारा
कर
लिया
किस
तरह
माँगूँ
ख़ुदास
अब
उसे
मैंने
मेरा
जब
सहारा
कर
लिया
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