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Ankur Mishra
seene pe mere jo patthar hai
seene pe mere jo patthar hai | सीने पे मेरे जो पत्थर है
- Ankur Mishra
सीने
पे
मेरे
जो
पत्थर
है
अब
यही
नक़्श-ए-मुक़द्दर
है
क्या
ख़बर
किस
ओर
जाना
है
हर
तरफ़
बंजर
ही
बंजर
है
ले
रहा
हूँ
साँस
मैं
लेकिन
चुभता
जैसे
कोई
ख़ंजर
है
छोड़
दूँ
उम्मीद
कैसे
मैं
शख़्स
वो
मेरे
ही
अंदर
है
बह
रहे
हैं
अश्क
आँखों
से
और
हैराँ
ये
समुंदर
है
- Ankur Mishra
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ज़िंदगी
से
सनम
ज़िंदगी
के
लिए
लोग
लड़ते
हैं
झूठी
ख़ुदी
के
लिए
ज़ेहन
पे
ज़ख़्म
उल्फ़त
का
तामीर
हो
ये
ज़रूरी
नहीं
ख़ुद-कुशी
के
लिए
ख़ुश्क
यादों
की
ख़ातिर
बशर
बेसबब
आँख
रोई
ज़रा
सी
नमी
के
लिए
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आँखें
ख़्वाबों
से
भर
लेते
हैं
इश्क़
दोबारा
कर
लेते
हैं
फिर
नहीं
आनी
बरसात
ये
और
कुछ
पल
ठहर
लेते
हैं
क्या
ख़बर
कब
बिछड़
जाएँ
हम
याद
तुमको
तो
कर
लेते
हैं
सीने
से
फिर
लगा
लो
हमें
हम
ज़रा
सा
बिखर
लेते
हैं
मुद्दतों
बाद
तो
आए
हो
थोड़ा
हम
भी
सँवर
लेते
हैं
पास
आओ
हमारे
कि
हम
होंठों
पे
होंठ
धर
लेते
हैं
कब
से
हैं
हम
अकेले
यहाँ
इश्क़
दोबारा
कर
लेते
हैं
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Ankur Mishra
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आदतन
मजबूर
थे
हम
कुछ
नशे
में
चूर
थे
हम
आते
कैसे
मिलने
तुझ
सेे
ख़ुद
से
ही
जब
दूर
थे
हम
सोचा
कर
लें
ख़ुद-कुशी
पर
थोड़े
से
आज़ूर
थे
हम
तू
हुआ
था
दूर
जबसे
तब
से
ही
बे-नूर
थे
हम
तूने
भी
देखा
नहीं
पर
ख़ाली
ख़ाली
झूर
थे
हम
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Ankur Mishra
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हम
भी
पढ़ते
पर
मोहब्बत
में
हर्फ़
दिखते
हैं
कहाँ
ख़त
में
आइने
की
सम्त
बैठा
है
आइना
इक
तेरी
सूरत
में
बा-वफ़ा
होकर
भी
अंकुर
ने
है
गुज़ारी
बस
जहालत
में
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फिर
उसी
की
प्यास
में
थे
ज़िंदगी
की
आस
में
थे
हम
कभी
ऐ
हम-नशीं
उस
हम-नवा
के
ख़ास
में
थे
फ़ासलों
से
राब्तों
तक
दर्द
ही
अहसास
में
थे
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