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Ankur Mishra
kar raha tha talaash-e-sukoon main
kar raha tha talaash-e-sukoon main | कर रहा था तलाश-ए-सुकूँ मैं
- Ankur Mishra
कर
रहा
था
तलाश-ए-सुकूँ
मैं
इसलिए
आज
भी
तन्हा
हूँ
मैं
एक
अर्सा
हुआ
ख़ुद
से
बिछड़े
और
कितनी
वफ़ा
अब
करूँँ
मैं
देख
लो
अब
तो
इक
बार
मुड़
के
ख़त
तुम्हें
और
कितने
लिखूँ
मैं
शाम
भी
कब
की
वो
ढल
चुकी
है
लौट
आओ
कि
अब
मर
सकूँ
मैं
मुद्दतों
से
हूँ
प्यासा
मैं
'अंकुर'
साथ
अश्कों
के
कितना
रहूँ
मैं
- Ankur Mishra
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हमपे
भी
अब्र-ए-करम
हो
दर्द
हो
पर
थोड़ा
कम
हो
थक
गया
हूँ
रोते
रोते
आँख
थोड़ी
तो
ये
नम
हो
खो
दिया
है
ख़ुद
को
मैंने
ख़त्म
अब
तो
ये
सितम
हो
मुद्दतों
लौटा
नहीं
वो
क्या
मोहब्बत
क्या
भरम
हो
टूट
जाए
इस
सेे
पहले
पूरी
अंकुर
इक
क़सम
हो
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ज़िंदा
है
अब
भी
किरदार
वो
उठ
गया
देख
बीमार
वो
माना
आदत
बुरी
है
ये
पर
देखता
ही
नहीं
यार
वो
एक
अर्सा
हुआ
दिल
दिए
करता
है
फिर
भी
व्यापार
वो
रास्ता
है
ये
मुश्किल
मगर
सब
सेे
होता
कहाँ
प्यार
वो
आज
भी
तन्हा
हूँ
मैं
बशर
दरिया
करता
नहीं
पार
वो
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पलकों
पे
जो
शबनम
लिए
फिरते
रहे
तेरा
ही
था
जो
ग़म
लिए
फिरते
रहे
नम
ख़्वाहिशों
की
इस
ज़मीं
पे
बेसबब
तर
ख़्वाब
हम-दम
हम
लिए
फिरते
रहे
वीरान
सी
आँखों
में
जान-ए-जाँ
कई
हम
मुख़्तसर
मौसम
लिए
फिरते
रहे
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सम्त
उसकी
हर
नज़र
है
क्या
यही
हुस्न-ए-असर
है
जानता
हूँ
जानता
है
अब
तलक
वो
बे-ख़बर
है
सामने
है
आइना
या
आइने
में
वो
नज़र
है
इन
लबों
पे
उन
लबों
का
अब
कहाँ
वैसा
असर
है
ढूँढता
है
हम-सफ़र
वो
ख़ुद
जो
अंकुर
दर-ब-दर
है
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फिर
कहीं
राह-ए-रज़ा
में
खो
न
जाऊँ
इस
अना
में
देखता
हूँ
रोज़
ख़ुद
को
डूबते
बहर-ए-फ़ना
में
है
सजी
दुल्हन
सी
फिर
क्यूँ
रात
ये
आब-ए-हया
में
ढल
रही
है
किसलिए
ये
चाँदनी
अंकुर
सबा
में
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