raftaar-e-umr qat-e-rah-e-iztiraab hai | रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है

  - Mirza Ghalib
रफ़्तार-ए-उम्रक़त-ए-रह-ए-इज़्तिराबहै
इससालकेहिसाबकोबर्क़आफ़्ताबहै
मीना-ए-मयहैसर्वनशात-ए-बहारसे
बाल-ए-तदर्रवजल्वा-ए-मौज-ए-शराबहै
ज़ख़्मीहुआहैपाश्नापा-ए-सबातका
नेभागनेकीगूँइक़ामतकीताबहै
जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँहैशश-जिहत
ग़ाफ़िलगुमाँकरेहैकिगेतीख़राबहै
नज़्ज़ाराक्याहरीफ़होउसबर्क़-ए-हुस्नका
जोश-ए-बहारजल्वेकोजिसकेनक़ाबहै
मैंना-मुराददिलकीतसल्लीकोक्याकरूँँ
मानाकितेरेरुख़सेनिगहकामयाबहै
गुज़रा'असद'मसर्रत-ए-पैग़ाम-ए-यारसे
क़ासिदपेमुझकोरश्क-ए-सवाल-ओ-जवाबहै
ज़ाहिरहैतर्ज़-ए-क़ैदसेसय्यादकीग़रज़
जोदानादाममेंहैसोअश्क-ए-कबाबहै
बे-चश्म-ए-दिलकरहवस-ए-सैर-ए-लाला-ज़ार
या'नीयेहरवरक़वरक़-ए-इंतिख़ाबहै
  - Mirza Ghalib
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