ghuncha-e-naa-shagufta ko door se mat dikha ki yuñ | ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँँ

  - Mirza Ghalib
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ताकोदूरसेमतदिखाकियूँँ
बोसेकोपूछताहूँमैंमुँहसेमुझेबताकियूँँ
पुर्सिश-ए-तर्ज़-ए-दिलबरीकीजिएक्याकिबिनकहे
उसकेहरएकइशारेसेनिकलेहैयेअदाकियूँँ
रातकेवक़्तमयपिएसाथरक़ीबकोलिए
आएवोयाँख़ुदाकरेपरकरेख़ुदाकियूँँ
ग़ैरसेरातक्याबनीयेजोकहातोदेखिए
सामनेआनबैठनाऔरयेदेखनाकियूँँ
बज़्ममेंउसकेरू-ब-रूक्यूँँख़मोशबैठिए
उसकीतोख़ामुशीमेंभीहैयहीमुद्दआकियूँँ
मैंनेकहाकिबज़्म-ए-नाज़चाहिएग़ैरसेतही
सुनकेसितम-ज़रीफ़नेमुझकोउठादियाकियूँँ
मुझसेकहाजोयारनेजातेहैंहोशकिसतरह
देखकेमेरीबे-ख़ुदीचलनेलगीहवाकियूँँ
कबमुझेकू-ए-यारमेंरहनेकीवज़्अयादथी
आइना-दारबनगईहैरत-ए-नक़्श-ए-पाकियूँँ
गरतिरेदिलमेंहोख़यालवस्लमेंशौक़काज़वाल
मौजमुहीत-ए-आबमेंमारेहैदस्त-ओ-पाकियूँँ
जोयेकहेकिरेख़्ताक्यूँँकेहोरश्क-ए-फ़ारसी
गुफ़्ता-ए-'ग़ालिब'एकबारपढ़केउसेसुनाकियूँँ
  - Mirza Ghalib
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