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Meem Maroof Ashraf
vo jo qaisar nahin hai qismat men
vo jo qaisar nahin hai qismat men | वो जो 'क़ैसर' नहीं है क़िस्मत में
- Meem Maroof Ashraf
वो
जो
'क़ैसर'
नहीं
है
क़िस्मत
में
कितनी
हसरत
है
उस
को
पाने
की
- Meem Maroof Ashraf
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दिल-लगी
में
हसरत-ए-दिल
कुछ
निकल
जाती
तो
है
बोसे
ले
लेते
हैं
हम
दो-चार
हँसते
बोलते
Munshi Amirullah Tasleem
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तिरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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क़त्ल
से
पहले
वो
हर
शख़्स
के
दिल
की
हसरत
पूछ
लेता
था
मगर
पूरी
नहीं
करता
था
Vishnu virat
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इक
तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल
है
सो
वो
उन
को
मुबारक
इक
अर्ज़-ए-तमन्ना
है
सो
हम
करते
रहेंगे
Faiz Ahmad Faiz
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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उसकी
हसरत
है
जिसे
दिल
से
मिटा
भी
न
सकूँ
ढूँडने
उसको
चला
हूँ
जिसे
पा
भी
न
सकूँ
Ameer Minai
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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कभी
तो
मुझे
छोड़
जाओगे
तुम
भी
कहोगे
मुझे
अब
कि
फुर्सत
नहीं
है
भला
इस
तरह
क्यूँ
सताने
लगे
हो
कहीं
छोड़
जाने
की
हसरत
नहीं
है
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Tiwari Jitendra
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जा-ब-जा
तुझ
को
देखता
था
मैं
इस
क़दर
तुझ
को
सोचता
था
मैं
Meem Maroof Ashraf
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देखो
जिस
ज़ाविए
से
दिल-कश
है
वो
तो
माह-ए-तमाम
है
'क़ैसर'
Meem Maroof Ashraf
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रंज-ओ-आज़ार
देखना
है
हमें
और
लगातार
देखना
है
हमें
फिर
से
आएगी
एक
सुब्ह
नई
फिर
से
अख़बार
देखना
है
हमें
तेरे
जैसा
ही
काश
तुझ
को
मिले
तुझ
को
बीमार
देखना
है
हमें
हुस्न
को
आज़मा
के
देख
लिया
अब
के
किरदार
देखना
है
हमें
ऐसे
कैसे
किसी
को
चाहे
फिरें
अपना
में'यार
देखना
है
हमें
यूँँ
ही
बाँहों
में
जान
सिमटी
रहो
सारा
संसार
देखना
है
हमें
हैं
कहाँ
गुम
शराब
आँखें
तिरी
ख़ुद
को
सरशार
देखना
है
हमें
ढूँढ़
कर
लाओ
मेरे
पास
उसे
यारों
दिल-दार
देखना
है
हमें
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Meem Maroof Ashraf
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बच
के
रहना
कि
हाँ
वही
लड़की
का'बा-ए-दिल
को
ढाने
वाली
है
Meem Maroof Ashraf
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उस
को
आदत
है
दिल
दुखाने
की
मेरी
ख़सलत
है
मुस्कुराने
की
मुस्तक़िल
उस
को
याद
करता
हूँ
जिस
को
कोशिश
है
भूल
जाने
की
गर्द-आलूद
हो
गई
ख़्वाहिश
वो
जो
ख़्वाहिश
थी
तुझ
को
पाने
की
ज़ख़्म
इस
दर्जा
हम
ने
खाए
हैं
कि
ज़रुरत
नहीं
है
खाने
की
तुझ
को
जब
याद
ही
नहीं
करता
क्या
ज़रूरत
है
याद
आने
की
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Meem Maroof Ashraf
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