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maqbul alam
ro
ro | रोकिए उनको ना जाने दीजिए
- maqbul alam
रोकिए
उनको
ना
जाने
दीजिए
प्यार
से
अब
मुस्कुराने
दीजिए
इश्क़
को
गहराई
गर
देना
है
तो
रूठिए
और
फिर
मनाने
दीजिए
रख
दिए
है
बाम
पे
सारे
दिए
ज़ोर
आंधी
को
लगाने
दीजिए
आप
क्यूँँं
झट
से
गले
लग
जाते
है
पहले
हमको
आज़माने
दीजिए
चाँद
में
होगा
इज़ाफ़
ए
रौशनी
उनको
पर्दा
तो
उठाने
दीजिए
- maqbul alam
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अवल्ली
इश्क़
के
एहसास
भी
तारी
रक्खे
और
इस
बीच
नए
काम
भी
जारी
रक्खे
मैंने
दिल
रख
लिया
है
ये
भी
कोई
कम
तो
नहीं
दूसरा
ढूँढ़
लो
जो
बात
तुम्हारी
रक्खे
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Ashu Mishra
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इश्क़
के
इज़हार
में
हर-चंद
रुस्वाई
तो
है
पर
करूँँ
क्या
अब
तबीअत
आप
पर
आई
तो
है
Akbar Allahabadi
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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माना
के
मोहब्बत
का
छुपाना
है
मोहब्बत
चुपके
से
किसी
रोज़
जताने
के
लिए
आ
Ahmad Faraz
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भुला
पाना
बहुत
मुश्किल
है
सब
कुछ
याद
रहता
है
मोहब्बत
करने
वाला
इस
लिए
बर्बाद
रहता
है
Munawwar Rana
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पलट
कर
लौट
आने
में
मज़ा
भी
है
मुहब्बत
भी
बुलाकर
देख
लो
शायद
पलट
कर
लौट
आएँ
हम
Gaurav Singh
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कितना
झूठा
था
अपना
सच्चा
इश्क़
हिज्र
से
दोनों
ज़िंदा
बच
निकले
Prit
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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जब
चाहें
सो
जाते
थे
हम,
तुम
सेे
बातें
करके
तब
उल्टी
गिनती
गिनने
से
भी
नींद
नहीं
आती
है
अब
इश्क़
मुहब्बत
पर
ग़ालिब
के
शे'र
सुनाए
उसको
जब
पहले
थोड़ा
शरमाई
वो
फिर
बोली
इसका
मतलब?
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Tanoj Dadhich
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मैं
चाहता
हूँ
मोहब्बत
मेरा
वो
हाल
करे
कि
ख़्वाब
में
भी
दोबारा
कभी
मजाल
न
हो
Jawwad Sheikh
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रूहों
को
शमशान
पकड़
के
ले
आई
दो
जिस्मों
को
जान
पकड़
के
ले
आई
कोई
ना
पहचान
सका
था
मुझको
फिर
गज़लों
की
पहचान
पकड़
के
ले
आई
मैं
जाने
वाला
ही
था
की
इक
लम्हे
में
तेरी
इक
एहसान
पकड़
के
ले
आई
मेरे
रब
की
रहमत
जोश
में
आई
तो
किस्मत
इक
मेहमान
पकड़
के
ले
आई
उसको
था
गुमान
डूबा
देगा
मुझको
मां
दरिया
से
कान
पकड़
के
ले
आई
ख़ुशियाँ
मीलों
दूर
खड़ी
थी
की
"आलम"
बेटी
की
मुस्कान
पकड़
के
ले
आई
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maqbul alam
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तेरी
तस्वीर
ना
हो
सीने
में
क्या
मज़ा
ख़ाक
ऐसे
जीने
में
जाम
हाथों
में
सामने
तू
है
ऐसी
मुश्किल
हुई
है
पीने
में
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अगर
ये
दरिया
समुंदर
में
मिल
गया
सोचो
गुरुर
आने
लगा
मीठा
दिल
गया
सोचो
गले
लगाते
ही
पागल
ख़ुशी
से
हो
जाता
महज़
हँसी
से
ही
मेरे
जो
खिल
गया
सोचो
अगर
मैं
चींखता
तो
वो
वहीं
पे
मर
जाता
जो
आज
मेरी
इन
अश्कों
से
हिल
गया
सोचो
ये
दुनिया
मुफ़्त
में
देगी
बिला-ज़रूरत
भी
पुराना
ज़ख़्म
जो
सीने
का
सिल
गया
सोचो
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राधे-राधे
मन
ये
बोले
मोहन
तुम
समझाओ
ना
तन्हा-तन्हा
बैठे
है
हम
बंसी
ज़रा
बजाओ
ना
गोपी
सारी
रूठ
गई
है
दरिया
सूना-सूना
है
दरिया
से
तुम
मेल
रचाकर
गगरी
को
चटकाओ
ना
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लोग
बैठे
है
जो
सभी
तन्हा
उनको
ना
छोड़ना
कभी
तन्हा
ये
जो
महफिल
लगी
है
रोने
पर
हँस
के
हो
जाऊंगा
अभी
तन्हा
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