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Manohar Shimpi
rang holi ka KHushi se hi lagaaya tum karo
rang holi ka KHushi se hi lagaaya tum karo | रंग होली का ख़ुशी से ही लगाया तुम करो
- Manohar Shimpi
रंग
होली
का
ख़ुशी
से
ही
लगाया
तुम
करो
जश्न
रंगों
का
कभी
मिलके
मनाया
तुम
करो
- Manohar Shimpi
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हुस्न
की
तुर्फ़गी
किसे
मिलती
साथ
में
सादगी
किसे
मिलती
है
अगर
बा-सफ़ा
मुहब्बत
तो
ऐसे
दीवानगी
किसे
मिलती
इश्क़
की
ख़ामुशी
ज़ुबाँ
होती
फिर
ये
आज़ुर्दगी
किसे
मिलती
आज
कल
गुल
भी
काग़ज़ी
होते
फिर
तर-ओ-ताज़गी
किसे
मिलती
राह
जब
एक
ही
रहे
आख़िर
फिर
तेरी
बंदगी
किसे
मिलती
रोज़
चलते
सभी
इशारे
पर
अस्ल
की
ज़िंदगी
किसे
मिलती
और
क्या
चाहिए
'मनोहर'
अब
ऐसे
दिलबस्तगी
किसे
मिलती
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टूट
जाए
यक़ीन
जब
कोई
क्यूँ
करे
इंतिजार
तब
कोई
देखने
से
लगा
वो
अपना
ही
जान
ले
तू
हसब-नसब
कोई
दौड़ता
जब
दिमाग़
ही
सब
का
सीखता
तब
नया
लक़ब
कोई
तोड़ती
दम
अगर
सियासत
ही
डोर
था
में
तभी
अजब
कोई
आदमी
होशियार
वो
लगता
सीख
फिर
जीने
के
सबब
कोई
जब
बयाँ
हिज्र
हो
सितारों
से
झिलमिलाते
कटे
न
शब
कोई
रूठ
के
ही
गया
'मनोहर'
वो
छोड़
जाए
न
दोस्त
कब
कोई
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सच
ग़लत
का
तलबगार
है
ही
नहीं
इसलिए
कोई
तकरार
है
ही
नहीं
शक्ल
सूरत
लगे
और
ही
कुछ
तभी
मरकज़ी
है
वो
किरदार
है
ही
नहीं
इश्क़
का
रंग
जब
और
भद्दा
लगे
बे-वफ़ा
है
वफ़ादार
है
ही
नहीं
बद-म'आशी
जहाँ
पर
कहीं
भी
रहे
फिर
वहाँ
कोई
सरकार
है
ही
नहीं
इश्क़
पर
ही
लिखी
है
"मनोहर"
ग़ज़ल
क्या
मुहब्बत
करे
प्यार
है
ही
नहीं
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हम
हम-नफ़स
कैसे
किधर
फिर
फ़र्क़
पडता
है
जब
टूटता
दिल
है
इधर
फिर
फर्क
पडता
है
Manohar Shimpi
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किसी
आँखों
में
क्या
हम
को
नज़र
आता
उसी
में
आसमाँ
दरिया
समा
जाता
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