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Manohar Shimpi
jaise maa-baap ka haq ada hi hua
jaise maa-baap ka haq ada hi hua | जैसे माँ-बाप का हक़ अदा ही हुआ
- Manohar Shimpi
जैसे
माँ-बाप
का
हक़
अदा
ही
हुआ
तब
से
माँ
की
दु'आ
से
भला
ही
हुआ
- Manohar Shimpi
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हर
घर
दियों
से
ही
हमीं
महफ़िल
सजाते
हैं
चलो
जश्न-ए-चराग़ाँ
भी
सभी
मिलके
मनाते
हैं
चलो
Manohar Shimpi
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आसमाँ
सी
तेरी
महारत
है
गुफ़्तुगू
ये
नहीं
हक़ीक़त
है
हिज्र
बेचैन
क्यूँँ
करें
रह
के
तू
ग़लत
है
नहीं
मसाफ़त
है
बोलना
और
था
उसे
लेकिन
झूठ
में
भी
छिपी
सदाक़त
है
दोस्त
सारे
लगे
सयाने
ही
दोस्ती
में
दिखी
रफ़ाक़त
है
गुल
गुल-ए-तर
रहे
"मनोहर"
सब
सिर्फ़
ख़ारों
से
जब
हिफ़ाज़त
है
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Manohar Shimpi
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शजर
ही
आसरा
सब
को
सही
देता
किसी
को
भी
घना
साया
वही
देता
ज़रा
तुम
ख़ूबियों
पर
ध्यान
तो
देना
जिए
कैसे
वही
खाता-बही
देता
शजर
बूढ़ा
हमेशा
फल
कहाँ
देता
हक़ीक़त
में
बड़ा
अंजाम
ही
देता
जुदा
हो
के
सदा
शादाब
ही
होता
वो
सहरा
में
हमें
साया
वही
देता
जहाँ
में
जब
अकेला
ही
कोई
होता
दु'आ
माँ-बाप
जैसे
ही
वही
देता
शजर
का
फिर
कहाँ
मज़हब
कोई
होता
किसी
भी
रंग
में
रंगत
वही
देता
“मनोहर”
हक़
जताए
जब
लकड़हारा
शजर
को
कौन
फिर
जीने
सही
देता
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Manohar Shimpi
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रात
ने
ओढ़
ली
घनी
चादर
अब
वो
तारे
निहारती
होगी
Manohar Shimpi
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मौजूद
जब
हो
हुस्न
सारे
घर-ब-घर
क्यूँँ
हुस्न
को
सब
ढूँढ़ते
हैं
दर-ब-दर
Manohar Shimpi
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