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Manohar Shimpi
saal aa.e naya KHabar hoti
saal aa.e naya KHabar hoti | साल आए नया ख़बर होती
- Manohar Shimpi
साल
आए
नया
ख़बर
होती
ख़ूब
शाम-ओ-सहर
नज़र
होती
वक़्त
रहते
पहल
करे
तो
फिर
इक
मुलाक़ात
भी
ज़फ़र
होती
इश्क़
माना
अगर
समुंदर
है
फिर
मुहब्बत
ही
हम
सेफ़र
होती
झूठ
का
कोई
ले
सहारा
जब
कोई
भी
बात
बे-असर
होती
कैफ़ियत
से
ही
बे-ख़बर
हो
तो
क़द्र-दाँ
की
किसे
ख़बर
होती
- Manohar Shimpi
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ज़रा
सा
झूठ
ही
कह
दो
मेरे
बिन
तुम
अधूरे
हो
तुम्हारा
क्या
बिगड़ता
है
ज़रा
सी
बात
कहने
में
Parveen Shakir
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किसी
उम्मीद
का
ये
इस्तिआरा
जान
पड़ता
है
कि
तन्हा
ही
सही
सच
झूट
से
अब
रोज़
लड़ता
है
Tarun Pandey
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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तुम
इन
लबों
की
हँसी
और
ख़ुशी
पे
मत
जाना
ये
रोज़
रोज़
हमें
भी
फ़रेब
देते
हैं
Shadab Asghar
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मेहनत
तो
करता
हूँ
फिर
भी
घर
ख़ाली
है
बाबूजी
मिट्टी
के
कुछ
दीपक
ले
लो
दीवाली
है
बाबूजी
मिट्टी
बेच
रहा
हूँ
जिस
में
कोई
जाल
फ़रेब
नहीं
सोना
चाँदी
दूध
मिठाई
सब
जा'ली
है
बाबूजी
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Gyan Prakash Akul
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वो
बहुत
चालाक
है
लेकिन
अगर
हिम्मत
करें
पहला
पहला
झूट
है
उस
को
यक़ीं
आ
जाएगा
Zafar Iqbal
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फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल
न
पूछिए
'मजरूह'
शराब
एक
है
बदले
हुए
हैं
पैमाने
Majrooh Sultanpuri
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अगर
सच
इतना
ज़ालिम
है
तो
हम
से
झूट
ही
बोलो
हमें
आता
है
पतझड़
के
दिनों
गुल-बार
हो
जाना
Ada Jafarey
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फ़रेब
दे
के
उसे
जीतना
गवारा
नहीं
अगर
वो
दिल
से
हमारा
नहीं
हमारा
नहीं
Azhar Nawaz
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किसी
के
झूठ
से
पर्दा
हटाकर
हमारा
सच
बहुत
रोया
था
उस
दिन
Shadab Asghar
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मुब्तसिम
सी
हँसी
थमी
सी
है
तेरी
मुस्कान
में
कमी
सी
है
आज
क्यूँँ
ही
बुझी
बुझी
सी
हो
आँख
में
फिर
दिखे
नमी
सी
है
वो
बिछड़के
कभी
कभी
मिलना
बात
ही
ख़ास
बाहमी
सी
है
सिर्फ़
मंज़िल
तेरी
मेरी
इक
हो
आरज़ू
आम
आदमी
सी
है
इंतिहा
की
कहाँ
घड़ी
ही
है
फिर
हमें
क्यूँ
दिखी
ख़मी
सी
है
इस
तरह
ये
बहार
ही
आई
ये
फ़ज़ा
भी
न
मौसमी
सी
है
वक़्त
की
ये
सुई
रुके
है
कब
रुत
यही
महज़
लाज़मी
सी
है
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Manohar Shimpi
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चाय
उस
के
हाथ
की
जब
हो
'मनोहर'
ज़ाइक़े
का
लुत्फ़
भी
फिर
और
होता
Manohar Shimpi
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शरीक-ए-ज़िंदगी
अच्छी
रहे
अरमान
ही
होता
ग़म-ए-जानाँ
सिवा
जीना
कहाँ
आसान
ही
होता
Manohar Shimpi
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दश्त
में
जो
अदू
थे
पुराने
लगे
दाव
वो
भी
नए
आज़माने
लगे
हम
अदू
से
लड़े
हैं
बहुत
जोश
में
होश
उनके
सही
अब
ठिकाने
लगे
ख़ूब
ऊंँचा
रहा
तेरा
रुतबा
सदा
सर
झुका
के
नज़र
सब
मिलाने
लगे
रोब
झूठा
दिखाते
रहे
हैं
वही
झूठ
क्या
और
सच
क्या
न
जाने
लगे
दाव
पर
दाव
कब
से
चले
हैं
यहाँ
ख़ूब
रखके
नज़र
आज़माने
लगे
रोब
हमने
'मनोहर'
बढ़ाया
बहुत
जश्न
आज़ादी
का
हम
मनाने
लगे
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Manohar Shimpi
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कर्ब
से
रिश्ता
ही
शायद
है
पुराना
ख़्वाब
दे
जाते
नया
फिर
इक
बहाना
रंज
कोई
था
नहीं
यारों
कभी
भी
दोस्तों
के
साथ
गुज़रा
है
ज़माना
हुस्न
के
जब
रंग
दिखते
और
ही
है
कोई
होता
है
किसी
का
तो
दिवाना
महज़
रुत
आती
चली
जाती
सदा
है
रुत
से
ज़्यादा
ख़ूब
बदला
है
ज़माना
कर्ब
के
ही
साथ
जी
ले
ऐ
मुसाफ़िर
आज
है
तू
कल
कहाँ
होगा
ठिकाना
टूटते
रिश्ते
यहाँ
पल
में
'मनोहर'
ऐ
बदलते
ही
जहाँ
का
है
फ़साना
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Manohar Shimpi
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