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Manohar Shimpi
Rosh itna badha badha sa hai
रोष इतना बढ़ा-बढ़ा सा है
- Manohar Shimpi
रोष
इतना
बढ़ा-बढ़ा
सा
है
हर
कोई
फिर
ख़फ़ा-ख़फ़ा
सा
है
एक
इल्ज़ाम
से
ही
दिल
टूटा
फिर
भी
तेरा
नशा-नशा
सा
है
हुस्न
भी
शबनमी
लगा
तेरा
फूल
जैसे
खिला-खिला
सा
है
इक
बड़े
हादिसे
से
ही
यारों
दिल-जला
फिर
ख़फ़ा-ख़फ़ा
सा
है
गुफ़्तगू
क्या
करे
किसी
से
अब
हिज्र
में
दिल
बुझा-बुझा
सा
है
बाग़
में
फूल
एक
ऐसा
है
रंग
उसका
उड़ा-उड़ा
सा
है
हश्र
भी
इम्तिहान
ही
लेता
हाँ
नतीजा
भला-भला
सा
है
- Manohar Shimpi
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लगे
अच्छा
जो
भी
कहने
दिया
जाए
पुरानी
बात
को
रहने
दिया
जाए
किसी
के
इश्क़
में
होता
फ़ना
कोई
वो
दर्द-ए-हिज्र
फिर
सहने
दिया
जाए
मेरी
ही
इंतिहा
का
तू
भी
हिस्सा
था
सफ़र
में
फ़ासला
रहने
दिया
जाए
ज़मीं
से
ही
इमारत
का
पता
चलता
बुरी
जब
नींव
हो
ढहने
दिया
जाए
ग़मों
में
फ़ासला
करता
अगर
कोई
उसे
वाजिब
जो
है
कहने
दिया
जाए
मनोहर
क्या
ख़ुशी
ग़म
को
बयाँ
करना
अभी
अश्कों
में
सब
बहने
दिया
जाए
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चौदहवीं
को
चाँद
थोड़ा
और
ही
इतराता
भूल
जाता
वो
अमावस
को
कहीं
खो
जाता
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तिफ़्ल-ए-हसीं
क़िस्सा
बयाँ
करने
लगा
सुनके
हँसी
से
पेट
ही
भरने
लगा
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रुत
कोई
भी
हो
बाग़
में
दिलकश
नज़ारा
ही
मिले
गुज़रे
ख़िज़ाँ
तब
इश्क़
का
दूजा
किनारा
ही
मिले
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आज
ख़ामोश
है
समा
इतना
आसमाँ
भी
बुझा
लगे
कितना
ढूँढ़ना
चाहते
जिसे
दिल
से
दंग
मिल
के
मैं
भी
हुआ
कितना
आसमाँ
गर्द
ही
रहे
जब
भी
ज़िक्र
हो
रंग
का
दिखे
जितना
चाँद
पूरा
फ़लक
पे
आता
तब
नूर
चेहरे
पे
ही
दिखे
इतना
अब
'मनोहर'
वजूद
का
क्या
है
ख़्वाब
देखा
कभी
बड़ा
कितना
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