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Manohar Shimpi
Maa badaulat raushani mujhko mili
माँ बदौलत रौशनी मुझ को मिली
- Manohar Shimpi
माँ
बदौलत
रौशनी
मुझ
को
मिली
इक
नई
ही
ज़िंदगी
मुझ
को
मिली
दूर
साहिल
से
हवा
ऐसे
चली
थी
हवा
जो
मौसमी
मुझ
को
मिली
आरज़ूओं
की
ख़बर
थी
ही
नहीं
कैसे
फिर
भी
तिश्नगी
मुझ
को
मिली
वास्ता
मेरा
नवाबों
से
कहाँ
उस
ज़बाँ
की
चाशनी
मुझ
को
मिली
त्याग
से
वैराग
होता
और
फिर
पैरहन
से
सादगी
मुझ
को
मिली
ज़िंदगी-नामा
'मनोहर'
था
ग़ज़ब
शे'र
पढ़
के
जीवनी
मुझ
को
मिली
- Manohar Shimpi
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ज़ेहन
में
है
मुलाक़ात
तेरी
याद
है
आज
भी
बात
तेरी
इत्र
जैसे
महक
ख़ूब
आती
तेज़
जब
तू
करे
बात
तेरी
याद
तू
ख़ूब
आती
मुझे
ही
फिर
न
भूलूँ
हसीं
रात
तेरी
क्यूँ
झुकी
थी
तभी
वो
निगाहें
बेज़ुबाँ
तो
न
थी
बात
तेरी
चंद
लम्हें
लगे
सिर्फ़
मिलने
हिज्र
में
क्यूँ
कटी
रात
तेरी
दूर
रहके
यहीं
है
लगे
तू
कब
सुनी
पास
से
बात
तेरी
अब
न
कोई
मुलाक़ात
बातें
लफ़्ज़
था
में
रहें
बात
तेरी
देखते
ही
रहा
ख़ामुशी
से
शाम-ए-ग़म
से
भरी
रात
तेरी
ख़्वाब
ऐसे
मनोहर
न
देखे
वक़्त-बे-वक़्त
बारात
तेरी
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कैसे
बेबाक
हैं
गुफ़्तगू
ही
करें
बेटियों
के
लिए
क्यूँँ
लहू
ही
करें
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शजर
ही
आसरा
सब
को
सही
देता
किसी
को
भी
घना
साया
वही
देता
ज़रा
तुम
ख़ूबियों
पर
ध्यान
तो
देना
जिए
कैसे
वही
खाता-बही
देता
शजर
बूढ़ा
हमेशा
फल
कहाँ
देता
हक़ीक़त
में
बड़ा
अंजाम
ही
देता
जुदा
हो
के
सदा
शादाब
ही
होता
वो
सहरा
में
हमें
साया
वही
देता
जहाँ
में
जब
अकेला
ही
कोई
होता
दु'आ
माँ-बाप
जैसे
ही
वही
देता
शजर
का
फिर
कहाँ
मज़हब
कोई
होता
किसी
भी
रंग
में
रंगत
वही
देता
“मनोहर”
हक़
जताए
जब
लकड़हारा
शजर
को
कौन
फिर
जीने
सही
देता
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बुरी
बात
का
क्यूँँ
न
इनकार
करना
हमेशा
सदाक़त
का
इक़रार
करना
खुले
आसमाँ
में
करे
जो
मुहब्बत
सभी
काश
कहते
उसे
प्यार
करना
ज़माने
मिसालें
किसे
अब
पता
हैं
ज़माने
की
रंगत
का
इक़रार
करना
हिफ़ाज़त
भरी
वो
नज़र
और
ही
है
पता
है
निगाहों
से
रुख़्सार
करना
बग़ावत
अदावत
करे
जो
हमेशा
उसे
ख़ूब
आता
है
तलवार
करना
बहारें
नज़ारे
बहारें
नज़ारे
कभी
हम-नशीं
का
ही
दीदार
करना
बयाँ
जो
किया
है
किसी
ने
ग़लत
तो
उसी
बात
का
फिर
तिरस्कार
करना
निगाहें
ज़ुबाँ
की
समझ
है
'मनोहर'
किसी
अजनबी
से
न
तकरार
करना
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कभी
तकरार
थोड़ी
सी
मुहब्बत
में
ज़रूरी
है
अगर
है
इश्क़
गहरा
फिर
वो
गहराई
उसी
में
हो
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