main ek shaam jo lautaa ghubaar-e-jaan ban kar | मैं एक शाम जो लौटा ग़ुबार-ए-जाँ बन कर

  - Manmohan Talkh
मैंएकशामजोलौटाग़ुबार-ए-जाँबनकर
बिखरकेरहगयाराहोंकीदास्ताँबनकर
मैंख़ुदमेंगूँजताहूँबनकेतेरासन्नाटा
मुझेदेखमिरीतरहबे-ज़बाँबनकर
मैंअपनेआपकावोशोरथातुझेपाकर
तुझेडरादियाआवाज़-ए-बे-अमाँबनकर
हरएकशख़्सहैअफ़्वाहआपहीअपनी
हरइककोजानताहैहरकोईगुमाँबनकर
तमामसम्तेंपलटतीसीजानपड़तीहैं
पहुँचरहाहूँकहाँदर्द-ए-ला-मकाँबनकर
येकिसकोढूँडरहाहूँमैंएकअर्सेसे
ख़ुदअपनाहीकोईभटकाहुआनिशाँबनकर
जोख़ुदथेअपनीसदाकायक़ींवहीतोहैंहम
पहाड़जैसेकोईउड़गयाधुआँबनकर
तूकरकेरद्दमुझेख़ुदकोज़राक़ुबूलतोकर
खड़ाहूँतेरेलिएएकइम्तिहाँबनकर
ख़ुदअपनीबातकादुखबनकेरहजा'तल्ख़'
हरएकदिलमेंसमाजाग़म-ए-जहाँबनकर
  - Manmohan Talkh
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