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Manish watan
seekha hai hamne ye hunar dheere-dheere
seekha hai hamne ye hunar dheere-dheere | सीखा है हमने ये हुनर धीरे-धीरे
- Manish watan
सीखा
है
हमने
ये
हुनर
धीरे-धीरे
कटता
कैसे
यार
सफ़र
धीरे-धीरे
कोई
आया
है
मिलने
उस-पार
हमें
सो
हम
है
बेचैन
इधर
धीरे-धीरे
इश्क़
सही
से
करना
गर
कोई
सीखे
तो
होता
है
इस
का
असर
धीरे-धीरे
तुमको
मुझ
सेे
कोई
और
चुरा
लेगा
गर
आओगे
तुम
जो
अगर
धीरे-धीरे
झुक
जाती
हैं
मेरी
पलकें
तब
ख़ुद
ही
जब
उठती
है
उन
की
नज़र
धीरे-धीरे
कोई
दिल
से
उतरे
तो
दुख
होता
है
धड़कन
मैं
मेरी
तू
उतर
धीरे-धीरे
मुझको
पाला
एसे
मम्मी
पापा
ने
बढ़ता
है
जैसे
कि
शजर
धीरे-धीरे
दूर
बुलंदी
पर
जाना
तय
है
मेरा
जाऊँगा
दोस्त
में
मगर
धीरे-धीरे
- Manish watan
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बहाने
मिलने
के
शायद
न
रोज़
रोज़
मिलें
किताब
माँग
लिया
कर
कभी
कभी
उस
सेे
Maher painter 'Musavvir'
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उसने
पूछा
था
पहले
हाल
मेरा
फिर
किया
देर
तक
मलाल
मेरा
मैं
वफ़ा
को
हुनर
समझता
था
मुझपे
भारी
पड़ा
कमाल
मेरा
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Subhan Asad
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ख़ुद
को
मनवाने
का
मुझको
भी
हुनर
आता
है
मैं
वो
कतरा
हूँ
समुंदर
मेरे
घर
आता
है
Waseem Barelvi
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गिफ़्ट
कर
देता
हूँ
उसको
मैं
किताबें,
लेकिन
उनको
पढ़
लेने
की
मोहलत
नहीं
देता
उसको
Harman Dinesh
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पा
ए
उम्मीद
प
रक्खे
हुए
सर
हैं
हम
लोग
हैं
न
होने
के
बराबर
ही
मगर
हैं
हम
लोग
तू
ने
बरता
ही
नहीं
ठीक
से
हम
को
ऐ
दोस्त
ऐब
लगते
हैं
ब-ज़ाहिर
प
हुनर
हैं
हम
लोग
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Abhishek shukla
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तमाम
उलझनों
में
भी
यूँँ
मुस्कुराता
है
न
जाने
इतना
हुनर
वो
कहाँ
से
लाता
है
Harsh saxena
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किताब-ए-इश्क़
में
हर
आह
एक
आयत
है
पर
आँसुओं
को
हुरूफ़-ए-मुक़त्तिआ'त
समझ
Umair Najmi
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कहाँ
हम
ग़ज़ल
का
हुनर
जानते
हैं
मगर
इस
ज़बाँ
का
असर
जानते
हैं
ये
वो
हुस्न
जिसको
निखारा
गया
है
नया
कुछ
नहीं
हम
ख़बर
जानते
हैं
कि
है
जो
क़फ़स
में
वो
पंछी
रिहा
हो
परिंदें
ज़मीं
के
शजर
जानते
हैं
फ़क़त
रूह
के
नाम
है
इश्क़
लेकिन
बदन
के
हवाले
से
घर
जानते
हैं
फ़ुलाँ
है
फ़ुलाँ
का
यक़ीं
हैं
हमें
भी
सुनो
हम
उसे
सर-ब-सर
जानते
हैं
कि
अब
यूँँ
सिखाओ
न
रस्म-ए-सियासत
झुकाना
कहाँ
है
ये
सर
जानते
हैं
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Neeraj Neer
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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उतारा
दिल
के
वरक़
पर
तो
कितना
पछताया
वो
इंतिसाब
जो
पहले
बस
इक
किताब
पे
था
Aanis Moin
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इतना
मत
इतराओ
उसकी
दी
शय
पर
देने
वाला
वापस
ले
भी
सकता
है
Manish watan
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बहुत
अच्छा
लगेगा
दिल
उदासी
का
उजाला
जब
भरेगा
बिल
उदासी
का
बुरे
अच्छे
दिखाई
दे
रहे
हैं
तो
बताओ
कौन
है
क़ातिल
उदासी
का
बिना
उसके
न
कोई
देख
सकता
है
मियाँ
ऐसी
जगह
है
तिल
उदासी
का
हमेशा
नोचते
आया
हमीं
को
तू
कभी
तो
ज़ख़्म
कोई
सिल
उदासी
का
मोहब्बत
मसअला
है
ख़ुद
बड़ा
इतना
कभी
मिलता
नहीं
साहिल
उदासी
का
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भाने
लगे
जब
से
दिलों
को
तन
नए
सो
मिट
गए
इस
में
बहुत
जीवन
नए
आशिक़
न
मानेंगे
मिरा
कहना
मगर
रहते
नहीं
घर
में
सदा
दर्पन
नए
ख़ुशियाँ
सभी
हाँ
इश्क़
मैं
मेरी
लगी
मुझको
खले
है
प्यार
के
कंगन
नए
बारिश
नई
उनको
बहुत
अच्छी
लगे
देखे
नहीं
जिसने
कभी
सावन
नए
ये
ज़िंदगी
इस
इश्क़
में
बर्बाद
है
फिर
भी
नहीं
होते
किसी
के
मन
नए
इस
मौत
से
होगी
कभी
शादी
मिरी
होंगे
किसी
के
हम
कभी
साजन
नए
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मुझे
मिलने
तो
आना
फिर
चले
जाना
हुआ
है
क्या
बताना
फिर
चले
जाना
मिरी
तो
मुश्किलें
तुमने
नहीं
देखीं
मगर
चेहरा
दिखाना
फिर
चले
जाना
लिखा
है
ग़म
हमारी
क़िस्मतों
में
सो
इसे
तुम
ख़ुद
मिटाना
फिर
चले
जाना
रहो
ख़ुशहाल
चाहे
फिर
कहीं
पर
तुम
मुझे
दिल
से
लगाना
फिर
चले
जाना
यहाँ
सब
कह
रहे
हैं
बे-वफ़ा
मुझको
इन्हें
तुम
सच
बताना
फिर
चले
जाना
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बस
इस
लिए
अपना
गुज़ारा
हो
गया
हर
ग़म
मिरा
ख़ुद
का
सहारा
हो
गया
कुछ
देर
क्या
लेटा
उदासी
ओढ़
कर
ये
ख़ुद
मिरा
था
और
प्यारा
हो
गया
ये
इश्क़
हमने
कर
लिया
था
दोस्तो
ये
हाल
क्या
देखो
हमारा
हो
गया
थोड़ी
ख़ुशी
की
आस
में
बैठा
रहा
इस
में
मिरा
काफ़ी
ख़सारा
हो
गया
तुमने
मुझे
छोड़ा
तभी
से
देख
लो
ये
दिल
मिरा
फिर
बे-सहारा
हो
गया
क्या
ग़म
भरी
ग़ज़लें
लिखेंगे
उम्र
भर
क्या
दुख
हमें
इतना
गवारा
हो
गया
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