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Kabir Altamash
ik din tum roogi ghar waale bhi roenge
ik din tum roogi ghar waale bhi roenge | इक दिन तुम रोओगी घर वाले भी रोएँगे
- Kabir Altamash
इक
दिन
तुम
रोओगी
घर
वाले
भी
रोएँगे
अपने
तो
अपने
बाहर
वाले
भी
रोएँगे
तुझको
मालूम
नहीं
लेकिन
तेरे
मरने
पर
नौकर
रोएगा
दफ़्तर
वाले
भी
रोएँगे
तुम
अब
के
और
ख़ुतूत
नहीं
भेजोगे
तो
फिर
ऐ
मेरे
यार
कबूतर
वाले
भी
रोएँगे
तुम
मुझको
रोने
पर
मजबूर
कभी
मत
करना
मैं
रोया
तो
मेरे
घर
वाले
भी
रोएँगे
- Kabir Altamash
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यार
उसके
क़ीमती
तोहफ़े
तो
लाए
थे
बहुत
मैं
बरेली
का
था
मैंने
ला
के
झुमका
दे
दिया
Rudransh Trigunayat
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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खुशियाँ
उसी
के
साथ
हैं
जो
ग़म
गुसार
है
ऐसे
हरेक
शख़्स
ही
दुनिया
का
यार
है
Sunny Seher
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दुआए
मांगते
हैं
इसीलिए
अपने
उजड़ने
की
हमें
तो
यार
तेरे
हाथ
से
तामीर
होना
हैं
Vishal Bagh
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दुश्मनी
कर
मगर
उसूल
के
साथ
मुझ
पर
इतनी
सी
मेहरबानी
हो
मेरे
में'यार
का
तक़ाज़ा
है
मेरा
दुश्मन
भी
ख़ानदानी
हो
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Akhtar Shumar
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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अब
उस
सेे
दोस्ती
है
जिस
सेे
कल
मुहब्बत
थी
अब
इस
सेे
ज़्यादा
बुरा
वक़्त
कुछ
नहीं
है
दोस्त
Vishal Singh Tabish
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हालत
जो
हमारी
है
तुम्हारी
तो
नहीं
है
ऐसा
है
तो
फिर
ये
कोई
यारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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मिले
किसी
से
गिरे
जिस
भी
जाल
पर
मेरे
दोस्त
मैं
उसको
छोड़
चुका
उसके
हाल
पर
मेरे
दोस्त
ज़मीं
पे
सबका
मुक़द्दर
तो
मेरे
जैसा
नहीं
किसी
के
साथ
तो
होगा
वो
कॉल
पर
मेरे
दोस्त
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Ali Zaryoun
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बादलों
में
से
छनता
हुआ
नूर
देख
ऐसी
रौशन
जबीं
है
मेरे
यार
की
Afzal Ali Afzal
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कभी
जब
ख़सारा
करूँँगा
तुम्हीं
को
पुकारा
करूँँगा
करूँँंगा
मुहब्बत
अगर
मैं
तुम्हीं
से
दुबारा
करूँँगा
अगर
मर
गए
आप
भी
तो
मैं
कैसे
गुज़ारा
करूँँगा
कभी
चूम
लूंगा
तुझे
मैं
कभी
बस
इशारा
करूँँगा
मुझे
भी
सही
से
पता
था
कि
हर
बार
हारा
करूँँगा
मुहब्बत
तुम्हीं
हो
तुम्हीं
को
ग़ज़ल
में
उतारा
करूँँगा
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Kabir Altamash
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कहता
है
क़ातिल
मुझको
अब
फिर
से
तू
मिल
मुझको
तुमको
जो
आसान
लगा
लगता
है
मुश्किल
मुझको
गर
तू
अच्छी
लड़की
है
कर
दिल
में
दाख़िल
मुझको
लड़का
अच्छा
है
पर
वो
लगता
है
बुज़दिल
मुझको
इक
दिल
था
जो
टूट
गया
और
नहीं
है
दिल
मुझको
दूर
खड़ा
हूँ
उस
सेे
पर
खींच
रहा
इक
तिल
मुझको
और
नहीं
पाना
कुछ
भी
जब
तुम
हो
हासिल
मुझको
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Kabir Altamash
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कितनी
ही
शर्म
की
बात
है
कि
तुम
मेरे
होते
हुए
भी
उदास
हो
Kabir Altamash
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मैंने
अब
तो
तन्हाई
को
भी
छोड़
दिया
इतना
तन्हा
कोई
ख़ुद
को
करता
है
क्या?
Kabir Altamash
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मैं
अब
तक
जिस
पर
यार
भरोसा
करता
था
वो
जब
भी
करता
था
बस
धोखा
करता
था
फिर
उसके
साथ
मुनाफ़ा
ये
भी
था
मेरा
मैं
जो
कुछ
भी
करता
था
अच्छा
करता
था
करता
रहता
था
यारों
में
जिसकी
बातें
वो
ही
बातों
से
मुझको
तन्हा
करता
था
मैं
सोच
समझ
कर
ही
अब
उसको
छोड़ा
हूँ
वो
सपनों
में
भी
मेरा
पीछा
करता
था
यारों
मैंने
उसको
तक
अपना
माना
है
जो
मुझको
मेरे
घर
को
गंदा
करता
था
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Kabir Altamash
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