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Harsh Kumar Bhatnagar
zindagi jeene ka ya rab mujhe dhab aa jaa.e
zindagi jeene ka ya rab mujhe dhab aa jaa.e | ज़िंदगी जीने का या रब मुझे ढब आ जाए
- Harsh Kumar Bhatnagar
ज़िंदगी
जीने
का
या
रब
मुझे
ढब
आ
जाए
मौत
का
क्या
है
न
जाने
कहाँ
कब
आ
जाए
मैंने
चेहरे
को
किया
साफ़
है
इन
आँसुओं
से
खींचने
को
मिरी
तस्वीर
वो
अब
आ
जाए
जब
वो
आए
तो
उसे
कहना
कि
माथा
चू
में
क्या
पता
कब
मिरे
होंठों
पे
तलब
आ
जाए
ऐ
ख़ुदा
मुझ
को
भले
आज
तवज्जोह
न
मिले
देर
से
ही
मुझे
पर
शेर-ओ-अदब
आ
जाए
- Harsh Kumar Bhatnagar
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यक-दम
ही
मुझको
होने
लगी
चाय
की
तलब
सिग्रेट
के
साथ
जा
के
मिटी
चाय
की
तलब
पीनी
पड़ी
शराब
हमें
दोस्तों
के
साथ
वर्ना
हमें
तो
अस्ल
में
थी
चाय
की
तलब
तुमको
पता
है
छोड़ना
आसाँ
नहीं
है
चाय
होंठों
से
ही
मिटेगी
मिरी
चाय
की
तलब
फिर
वो
कहाँ
बिछड़ने
का
सोचेगा
जब
उसे
लगने
लगेगी
नींद
में
भी
चाय
की
तलब
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दिल
खिलता
था
मेरा
गुलाबों
की
तरह
टूटा
पड़ा
है
अब
तो
ख़्वाबों
की
तरह
उसकी
तलब
ऐसी
कि
मिटती
ही
नहीं
वो
लगती
है
मुझको
किताबों
की
तरह
हम
उसको
समझें
भी
तो
कैसे
समझें
जो
चेहरा
बदलता
है
नक़ाबों
की
तरह
नग़्मों
के
जैसे
मैं
उसे
सुनता
हूँ
जब
वो
छूता
है
मुझको
रबाबों
की
तरह
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खा
रहा
है
तिरे
बाद
का
दुख
एक
शायर
को
है
दाद
का
दुख
लिख
रखी
तेरी
यादों
में
ग़ज़लें
है
मुझे
बस
उसी
याद
का
दुख
अब
तो
हर
बात
सुननी
पड़ेगी
इक
ससुर
को
है
दामाद
का
दुख
हाथ
सर
से
कहीं
उठ
न
जाए
चेले
को
एक
उस्ताद
का
दुख
मौत
माँगी
है
ख़्वाहिश
में
उसने
उस
ख़ुदा
को
है
फ़रियाद
का
दुख
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जो
दिल
का
दर्द
जहाँ
से
बयाँ
नहीं
करते
वो
लोग
कुछ
भी
यहाँ
की
वहाँ
नहीं
करते
जो
अपने
पाँव
के
नाख़ून
तोड़ते
हैं
रोज़
उन्हें
बताओ
कि
ये
चुग़लियाँ
नहीं
करते
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वो
कैसे
काटते
हैं
ज़िंदगी
बग़ैर
शिफ़ा
हमें
यक़ीं
है
वो
होंगे
दुखी
बग़ैर
शिफ़ा
तमाम
शब
ये
लगा
आज
टूट
जाऊँगा
मगर
मैं
जी
रहा
हूँ
वाक़ई
बग़ैर
शिफ़ा
उन्हीं
के
ख़ून
में
होती
है
सहने
की
हिम्मत
जो
लोग
काटते
हैं
मुफ़्लिसी
बग़ैर
शिफ़ा
तो
सोच
लेना
कि
अब
रोकना
नहीं
आसाँ
ये
साँस
चलती
रही
गर
मिरी
बग़ैर
शिफ़ा
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