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Harsh Kumar Bhatnagar
dartaa nahin qaza se main jeene se dartaa hooñ
dartaa nahin qaza se main jeene se dartaa hooñ | डरता नहीं क़ज़ा से मैं जीने से डरता हूँ
- Harsh Kumar Bhatnagar
डरता
नहीं
क़ज़ा
से
मैं
जीने
से
डरता
हूँ
मुझको
नशे
का
ग़म
नहीं
पीने
से
डरता
हूँ
कमरे
में
हर
तरफ़
मिरे
जाले
पड़े
बहुत
बर्बाद
हो
चुका
हूँ
क़रीने
से
डरता
हूँ
यूँँ
डर
नहीं
है
मुझको
समुंदर
में
जाने
से
बस
डूबते
हुए
मैं
सफ़ीने
से
डरता
हूँ
इतना
भी
वक़्त
मत
ले
तू
घर
लौट
आने
में
मैं
दिन
निकाल
लूँगा
महीने
से
डरता
हूँ
- Harsh Kumar Bhatnagar
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मिरा
शौक़
अपनी
जगह
है
मिरा
काम
अपनी
जगह
है
मिरा
दिन
तो
निकले
सर-ए-बज़्म
पर
शाम
अपनी
जगह
है
मैं
क्या
ही
नुमाइश
करूँँ
अपने
ग़म
अपनी
आदत
की
सब
में
ये
लहजा
भले
तल्ख़
है
पर
मिरा
नाम
अपनी
जगह
है
गिला
ये
नहीं
है
कि
दुनिया
ने
ठुकराया
है
मुझको
हर
वक़्त
मिरा
सब्र
अपनी
जगह
मेरा
कोहराम
अपनी
जगह
है
त'अल्लुक़
बिखरने
लगे
तो
छुपाने
की
कोशिश
न
करना
इज़ाफ़ा
तो
अपनी
जगह
है
ये
अंजाम
अपनी
जगह
है
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रुख़्सती
के
वक़्त
उसने
भी
पलट
के
देखा
है
थम
गया
है
दिल
मिरा
भी
उसने
जब
से
देखा
है
ये
ज़माने
के
लिए
दिल
मेरा
पत्थर
है
मगर
मेरे
कमरे
ने
मुझे
छुप
छुप
के
रोते
देखा
है
एक
'आशिक़
मर
गया
है
आशिक़ी
में
उसने
जब
अपनी
महबूबा
को
इक
डोली
में
बैठे
देखा
है
आज
की
नस्लें
मोहब्बत
पे
जो
ग़ज़लें
लिखती
हैं
डाँट
पड़ने
पर
इन्हीं
जैसों
को
रोते
देखा
है
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कभी
आसान
करती
है
कभी
मुश्किल
बढ़ाती
है
ये
दुनिया
मार
के
ठोकर
हमें
चलना
सिखाती
है
Harsh Kumar Bhatnagar
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जानता
हूँ
ये
तिरे
नक़्श-ए-कफ़-ए-पा
नहीं
है
इसलिए
चुप
हूँ
कि
तू
मेरा
असासा
नहीं
है
हम
हैं
मिट्टी
की
तरह
इस
में
ही
मिल
जाएँगे
अब
तलक
जो
है
कमाया
वो
भी
अपना
नहीं
है
पुतलियाँ
ही
हैं
बनाई
हुई
उस
रब
की
हम
कोई
मंदिर
कोई
मस्जिद
कोई
गिरजा
नहीं
है
वक़्त
के
साथ
बदल
जाता
है
सब
कुछ
लेकिन
गाँव
का
एक
मकाँ
आज
भी
बदला
नहीं
है
मैंने
पहले
ही
कहा
था
कि
मोहब्बत
के
बाद
दिल
तो
क्या
चीज़
है
इंसान
भी
बचता
नहीं
है
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दिल
खिलता
था
मेरा
गुलाबों
की
तरह
टूटा
पड़ा
है
अब
तो
ख़्वाबों
की
तरह
उसकी
तलब
ऐसी
कि
मिटती
ही
नहीं
वो
लगती
है
मुझको
किताबों
की
तरह
हम
उसको
समझें
भी
तो
कैसे
समझें
जो
चेहरा
बदलता
है
नक़ाबों
की
तरह
नग़्मों
के
जैसे
मैं
उसे
सुनता
हूँ
जब
वो
छूता
है
मुझको
रबाबों
की
तरह
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