larzate saayo se mubham nuqoosh ubharte hain | लरज़ते सायों से मुबहम नुक़ूश उभरते हैं

  - Mahmood Ayaz
लरज़तेसायोंसेमुबहमनुक़ूशउभरतेहैं
इकअन-कहीसीकहानी,इकअन-सुनीसीबात
तवीलरातकीख़ामोशियोंमेंढलतीहै
फ़सुर्दालम्हेख़लाओंमेंरंगभरतेहैं
सदाएँज़ेहनकीपिन्हाइयोंमेंगूँजतीहैं
ख़िज़ाँकेसाएझलकतेहैंतेरीआँखोंमें
तिरीनिगाहोंमेंरफ़्ताबहारोंकाग़महै''
हयातख़्वाब-गहोंमेंपनाहढूँडतीहै
फ़सुर्दालम्हेख़लाओंमेंरंगभरतेहैं
येगर्दिश-ए-मह-ओ-सालआज़माचुकीहैजिन्हें
येगर्दिश-ए-मह-ओ-सालआज़मारहीहैहमें
मगरयेसोचकिअंजाम-ए-कारक्याहोगा
दवामतेरामुक़द्दरहैऔरमेरानसीब
दवामकिसकोमिलाहैजोहमकोमिलजाता?
येचंदलम्हाअगरजावेदाँहोजाते
मैंसोचताहूँकिअपनानिशानक्याहोता
कहाँपेटूटताजब्र-ए-हयातकाअफ़्सूँ
कहाँपहुँचकेख़यालोंकोआसरामिलता?
फ़सुर्दालम्हो,अभीऔरबे-कराँहोजाओ
फ़सुर्दालम्हो,औरबे-कराँहोजाओ
  - Mahmood Ayaz
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