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Kiran K
chala doon ik muqadama gar kahii mil jaa.e phir se
chala doon ik muqadama gar kahii mil jaa.e phir se | चला दूँ इक मुक़दमा गर कहीं मिल जाए फिर से
- Kiran K
चला
दूँ
इक
मुक़दमा
गर
कहीं
मिल
जाए
फिर
से
कि
मेरा
क़त्ल
करके
लापता
है
ज़िंदगानी
- Kiran K
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पूछे
हैं
वजह-ए-गिरिया-ए-ख़ूनी
जो
मुझ
सेे
लोग
क्या
देखते
नहीं
हैं
सब
उस
बे-वफ़ा
का
रंग
Meer Taqi Meer
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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हमारा
इश्क़
इबादत
का
अगला
दर्जा
है
ख़ुदा
ने
छोड़
दिया
तो
तुम्हारा
नाम
लिया
ग़मों
से
बैर
था
सो
हमने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
शजर
ने
गिर
के
परिंदों
से
इन्तेक़ाम
लिया
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Balmohan Pandey
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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वो
क़त्ल
कर
के
मुझे
हर
किसी
से
पूछते
हैं
ये
काम
किसने
किया
है,
ये
काम
किस
का
था?
Dagh Dehlvi
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उसकी
तस्वीरें
हैं
दिलकश
तो
होंगी
जैसी
दीवारें
हैं
वैसा
साया
है
एक
मैं
हूँ
जो
तेरे
क़त्ल
की
कोशिश
में
था
एक
तू
है
जो
जेल
में
खाना
लाया
है
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Tehzeeb Hafi
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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रौशनी
कमरे
में
मेरे
देर
तक
ठहरी
रही
जब
उठी
मिज़गाँ
तो
इक
सूरज
मेरे
पहलू
में
था
Kiran K
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सुब्ह
की
पहली
अज़ाँ
में
सुन
रही
हूँ
नाम
तेरा
आजकल
मैं
मंदिरों
की
घण्टियाँ
भी
कब
भला
इतनी
मधुर
लगती
थीं
मुझको
Kiran K
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कैसे
कहूँ
दुनिया
है
ये
इंसानों
की
इंसानियत
रुस्वा
है
जब
हर
सूँ
यहाँ
Kiran K
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हम
ही
थे
उसके
रतजगे
में
किरण
नींद
में
भी
मुख़िल
रहे
हैं
हम
Kiran K
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ज़माना
तो
फ़िदा
है
मुस्कुराहट
पर
हमारी
मगर
दिल
थक
चुका
है
कसरत-ए-लब
से
बहुत
अब
Kiran K
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