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Kartik Bhalerao
qalam kii nok par banta hai ham jaison ka mustaqbil
qalam kii nok par banta hai ham jaison ka mustaqbil | क़लम की नोक पर बनता है हम जैसों का मुस्तक़बिल
- Kartik Bhalerao
क़लम
की
नोक
पर
बनता
है
हम
जैसों
का
मुस्तक़बिल
हमारा
बुत-परस्ती
से
गुज़ारा
हो
नहीं
सकता
- Kartik Bhalerao
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फ़ाएदा
नहीं
कोई
जा
के
बड़बड़ाने
में
जब
ज़मीर
बिक
जाए
अफ़सरों
का
थाने
में
पलने
वाला
टुकड़ों
पर
ख़ुद
को
शे'र
कहता
है
ज़िंदगी
गुज़ारी
है
जिसने
दुम
हिलाने
में
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इक
तुझको
छोड़
कर
किसी
के
हुस्न
का
नशा
सिगरेट
के
एक
कश
के
बराबर
नहीं
हुआ
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देखा
तो
आँखों
का
गुज़ारा
हो
गया
यूँँ
शक्ल-ओ-सूरत
का
इशारा
हो
गया
उस
इक
बला
की
चाह
में
कॉलेज
के
चालीस
लड़कों
का
ख़सारा
हो
गया
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चाहा
था
जो
भी
मैं
ने
वो
अक्सर
नहीं
हुआ
इक
शख़्स
था
जो
मेरा
मुक़द्दर
नहीं
हुआ
यारो
हक़ीक़तन
तो
बहुत
दूर
की
है
बात
वो
ख़्वाब
में
भी
मुझ
को
मुयस्सर
नहीं
हुआ
करना
पड़ा
मुझे
भी
तो
इस
दिल
का
एहतिराम
धोके
हज़ार
खा
के
जो
पत्थर
नहीं
हुआ
इक
उम्र
तीरगी
को
हटाने
में
लग
गई
दो
दिन
की
कोशिशों
से
मुनव्वर
नहीं
हुआ
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वक़्त
अच्छा
कब
आएगा
'नासिर'
आख़िरी
साँस
चल
रही
है
अभी
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