ये ग़ज़ल नज़्म ये नग़मात किसे पेश करूँँ

  - Karal 'Maahi'
येग़ज़लनज़्मयेनग़मातकिसेपेशकरूँँ
मैंमुहब्बतकेअमानातकिसेपेशकरूँँ
मैंहुआतेरीज़मींपरहीग़ज़लगोसाहिर
अपनेअशआर-ए-इबादातकिसेपेशकरूँँ
मेरेजीनेकोबहुतहैतिरेनग़्मेंसाहिर
आलम-ए-जज़्ब-ए-किफ़ायातकिसेपेशकरूँँ
बातइतनीहैकिमहबूबमिराहैसाहिर
बातइतनीभीमैंबे-बातकिसेपेशकरूँँ
इश्क़मुझकोमजाज़ीहक़ीक़ीमालूम
इश्क़साहिरहैयेख़ुतबातकिसेपेशकरूँँ
दादक्यादूँतिरीग़ज़लोंकीतुझेमैंसाहिर
बसकिवहशतकीयेबहुतातकिसेपेशकरूँँ
क्यूँँकहातूनेकिशाइरहैतूपलदोपलका
इंतिहाईमिरेजज़्बातकिसेपेशकरूँँ
ख़ाकसेबुतहुआफिरबुतसेहुआमैंइंसाँ
कैसेनाज़िलहुएनग़मातकिसेपेशकरूँँ
  - Karal 'Maahi'
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