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Kamal Upadhyay
chaand bhi kambal odhe niklaa tha
chaand bhi kambal odhe niklaa tha | चाँद भी कम्बल ओढ़े निकला था
- Kamal Upadhyay
चाँद
भी
कम्बल
ओढ़े
निकला
था
सितारे
ठिठुर
रहें
थे
सर्दी
बढ़
रही
थी
ठण्ड
से
बचने
के
लिए
मुझे
भी
कुछ
रिश्ते
जलाने
पड़े
कुछ
रिश्ते
जो
बस
नाम
के
बचे
थे
खींच
रहा
था
मैं
उन
को
कभी
वो
मुझे
खींचा
करते
थे
सर्दी
बढ़
रही
थी
ठण्ड
से
बचने
के
लिए
मुझे
भी
कुछ
रिश्ते
जलाने
पड़े
कुछ
रिश्ते
बहुत
कमज़ोर
हो
चले
थे
उन
की
लपट
भी
बहुत
कम
थी
कुछ
इतने
पतले
की
जलने
से
पहले
राख
हो
गए
सर्दी
बढ़
रही
थी
ठण्ड
से
बचने
के
लिए
मुझे
भी
कुछ
रिश्ते
जलाने
पड़े
कुछ
पुराने
रिश्ते
थे
मेरे
जनम
के
पहले
के
सजोया
था
उन्हें
मैं
ने
उन्हें
नहीं
था
कोई
लगाव
मुझ
से
सर्दी
बढ़
रही
थी
ठण्ड
से
बचने
के
लिए
मुझे
भी
कुछ
रिश्ते
जलाने
पड़े
- Kamal Upadhyay
आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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मैं
सोचता
हूँ
जब
कभी
आओगी
सामने
किस
मुँह
से
कह
सकूँगा
मोहब्बत
नहीं
रही
Shoonya
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बंद
कमरे
में
हज़ारों
मील
अब
चलते
हैं
हम
काफ़ी
महँगी
पड़
रही
है
शा'इरी
से
दोस्ती
Ashraf Jahangeer
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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बंद
कमरा,
सर
पे
पंखा,
तीरगी
है
और
मैं
एक
लड़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
है
औऱ
मैं
Shadab Asghar
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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तन्हा
ही
सही
लड़
तो
रही
है
वो
अकेली
बस
थक
के
गिरी
है
अभी
हारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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