jab k | जब कभी तुम

  - Kamal Upadhyay
जबकभीतुम
सिगरेटजलानेकी
कोशिशकरतेथे
मैंफूँकमारकर
बुझादेतीथी
कितनीबारकहाथा
तुमसे
येज़िंदगी
सिर्फ़तुम्हारीनहींहै
मेराजोदिलहै
वोतुम्हारेसिगरेटकेधुएँख़राबहोरहाहै
ऐश-ट्रेमेंबढ़तीराखज़िंदगीमेरी
सियाहहुईजातीहै
बुझायाकरोइन्हें
जलानेसेपहले
एककशज़िंदगीका
बुझीहुईसिगरेटसेलगाना
मैंनेसंजोकररखेहै
कुछपुरानेडब्बेसिगरेटके
जिसपरहमने
ज़िंदगीकाप्लानबनायाथा
वोसिगरेटख़राबहोगईहै
लेकिनप्लानअभीभी
संजीदालगताहै
अबनाजलानासिगरेट
अबमैंवहाँनहींहूँ
जलतीसिगरेटबुझानेको
  - Kamal Upadhyay
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