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"Nadeem khan' Kaavish"
muddat ke baad ghar ki taraf lautna hua
muddat ke baad ghar ki taraf lautna hua | मुद्दत के बाद घर की तरफ़ लौटना हुआ
- "Nadeem khan' Kaavish"
मुद्दत
के
बाद
घर
की
तरफ़
लौटना
हुआ
देखा
तो
जाना,
घर
से
मेरे
घर
निकल
गया
- "Nadeem khan' Kaavish"
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रोज़
ढक
लेती
थी
नीला
जिस्म
अपना
शुक्र
है
आ
गई
बाहर
घर
की
बातें
Parul Singh "Noor"
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हसीन
यादों
के
चाँद
को
अलविदा'अ
कह
कर
मैं
अपने
घर
के
अँधेरे
कमरों
में
लौट
आया
Hasan Abbasi
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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ज़मीं
पे
घर
बनाया
है
मगर
जन्नत
में
रहते
हैं
हमारी
ख़ुश-नसीबी
है
कि
हम
भारत
में
रहते
हैं
Mehshar Afridi
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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जो
बुजुर्गों
की
दु'आओं
के
दीयों
से
रौशन
रोज़
उस
घर
में
दीवाली
का
जश्न
होता
है
Pratap Somvanshi
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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गुमान
है
या
किसी
विश्वास
में
है
सभी
अच्छे
दिनों
की
आस
में
है
ये
कैसा
जश्न
है
घर
वापसी
का
अभी
तो
राम
ही
वनवास
में
है
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Azhar Iqbal
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सारी
हिम्मत
टूट
गई,
बच्चों
से
ये
सुनकर
अब
भूखे
पेट
गुज़ारा
करने
की
हिम्मत
है
फूँका
घर,
भूखे
बच्चे,
टूटी
उम्मीदें,
अब
मुझ
में,
रस्सी
को
फंदा
करने
की
हिम्मत
है
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Aman G Mishra
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कैसे
बनेगी
बात
मेरी
सूनी
पड़ी
है
रात
मेरी
वो
दूसरी
दुनिया
में
ख़ुश
है
शर्मिंदा
है
औक़ात
मेरी
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"Nadeem khan' Kaavish"
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कहो
तो
कभी
तुम
कोई
बात
हम
सेे
छिपाते
ही
रहते
हो
जज़्बात
हम
सेे
न
आँखें
न
बातें
न
साँसें
न
ही
दिल
हाँ
लेकिन
मिलाओ
कभी
हाथ
हम
सेे
किसी
और
का
कोई
हक़
भी
नहीं
है
कहानी
की
तेरी
शुरूआत
हम
से
हमारे
अलावा
न
हो
कोई
हम
सेा
तेरी
जीत
हम
सेे
तेरी
मात
हम
सेे
जिधर
भी
नज़र
हैं
है
चर्चे
तेरे
ही
बहुत
अच्छे
हैं
तेरे
हालात
हम
सेे
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तेरे
दिल
की
इक
ये
बस्ती
पहले
उस
इक
राजा
की
थी
जिसने
तेरे
नाम
पर
जंगें
भी
बे-अंदाज़ा
की
थी
क्या
हुआ
जो
आपने
रातों
की
नींदें
मार
डाली
हमने
भी
राहत
व
नुसरत
सुनके
यादें
ताज़ा
की
थी
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कोरे
काग़ज़
पर
बच्चों
की
शक्ल
बनाई
होती
थी
जब
भी
उसके
दरवाज़े
पर
आवाजाही
होती
थी
यूँँॅं
तो
सारी
महफ़िल
में
हम
ख़ुद
भी
जुदास
रहते
थे
वस्ल
की
रात
तो
हम
दोनों
की
ख़ूब
पढ़ाई
होती
थी
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"Nadeem khan' Kaavish"
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साथ
था
जिन
शामों
में
तू
छोड़कर
वो
अब
तो
हर
शा
में
सुहानी
लिख
रहे
हैं
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