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'June' Sahab Barelvi
izzat-e-nafs hai ghaneemat hai
izzat-e-nafs hai ghaneemat hai | इज़्ज़त-ए-नफ़्स है ग़नीमत है
- 'June' Sahab Barelvi
इज़्ज़त-ए-नफ़्स
है
ग़नीमत
है
क्यूँँ
गुज़रना
है
उस
की
गलियों
से
- 'June' Sahab Barelvi
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करना
क़िस्सा
मेरा
तमाम
है
क्या
कोई
ऐसा
भी
इंतिज़ाम
है
क्या
दोस्ती
कैसी
अजनबी
थे
अभी
ये
बता
मुझ
सेे
कोई
काम
है
क्या
मेरे
शे'रों
पे
थोड़ी
दाद
भी
दो
दूर
से
ही
दु'आ
सलाम
है
क्या
पल
गुज़रते
नहीं
सुकून
से
अब
उसके
हाथों
मेरी
लगाम
है
क्या
आती
मुझको
नहीं
पसंद
कोई
दिल
उसी
का
ही
अब
ग़ुलाम
है
क्या
क्यूँ
न
हो
अब
अयोध्या
काशी
कोई
मुग़लों
का
अब
निज़ाम
है
क्या
गर
हो
लिखते
तो
ये
भी
याद
रखो
कुछ
भी
लिखना
कोई
कलाम
है
क्या
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जो
पहली
दफ़्अ
में
मिल
जाता
सब
को
न
होता
इश्क़
से
हलकान
कोई
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बद-दुआ
जाने
किस
की
लगी
है
मुझे
तुम
दुआ-गो
रहो
कुछ
तो
आराम
हो
'June' Sahab Barelvi
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ऐसे
मज़दूर
राम
काज
करें
कोई
सेना
हो
जैसे
वानर
की
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किसने
समझा
है
औरतों
का
दुख
रेज़ा
रेज़ा
है
औरतों
का
दुख
तज़्किरा
भी
न
कर
सके
औरत
कौन
सुनता
है
औरतों
का
दुख
मर्द
का
दुख
बड़ा
या
औरत
का
मुझको
लगता
है
औरतों
का
दुख
दाद-ए-यज़्दानी
मिलती
है
उसको
जो
समझता
है
औरतों
का
दुख
चीरतीं
पेट
नस्ल-दर-नस्लें
समझो
कितना
है
औरतों
का
दुख
जन्म
से
लेके
ख़ाक
होने
तक
बढ़ता
रहता
है
औरतों
का
दुख
हो
के
हैरान
एक
दूजे
के
चेहरे
तकता
है
औरतों
का
दुख
या
ख़ुदा
कुछ
तो
राहतें
हों
अता
कम
न
होता
है
औरतों
का
दुख
अब
यक़ीनन
कहेगा
हर
कोई
जू'न
लिखता
है
औरतों
का
दुख
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