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Jitendra "jeet"
vo jab milta to ham paagal ho jaate the
vo jab milta to ham paagal ho jaate the | वो जब मिलता तो हम पागल हो जाते थे
- Jitendra "jeet"
वो
जब
मिलता
तो
हम
पागल
हो
जाते
थे
उसकी
नज़रों
से
हम
घाइल
हो
जाते
थे
उसने
तो
बस
पानी
लाने
को
कहना
था
हम
एक
इशारे
पर
बादल
हो
जाते
थे
उसने
तो
बस
बजने
की
कहना
था
मुझ
सेे
हम
उसके
पैरों
की
पायल
हो
जाते
थे
उसने
जब
भी
गालों
से
बहना
होता
था
हम
उसकी
आँखों
के
काजल
हो
जाते
थे
- Jitendra "jeet"
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अपनी
ज़बाँ
से
कुछ
न
कहेंगे
चुप
ही
रहेंगे
'आशिक़
लोग
तुम
से
तो
इतना
हो
सकता
है
पूछो
हाल
बेचारों
का
Ibn E Insha
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तुम्हारी
ख़ानदानी
रस्म
रस्म-ए-बेवफ़ाई
है
हमीं
पागल
थे
जो
तुम
पर
भरोसा
कर
लिया
हमने
Shajar Abbas
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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रोज़
तारों
को
नुमाइश
में
ख़लल
पड़ता
है
चाँद
पागल
है
अँधेरे
में
निकल
पड़ता
है
Rahat Indori
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सियाह
रात
की
सरहद
के
पार
ले
गया
है
अजीब
ख़्वाब
था
आँखें
उतार
ले
गया
है
है
अब
जो
ख़ल्क़
में
मजनूँ
के
नाम
से
मशहूर
वो
मेरी
ज़ात
से
वहशत
उधार
ले
गया
है
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Abhishek shukla
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बे-गिनती
बोसे
लेंगे
रुख़-ए-दिल-पसंद
के
आशिक़
तिरे
पढ़े
नहीं
इल्म-ए-हिसाब
को
Haidar Ali Aatish
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बरस
रही
है
आँखें
हैं
ये
इनको
बादल
मत
कहना
मौत
हुई
है
दिल
की
मेरे
उसको
घाइल
मत
कहना
जीवन
भर
वो
साथ
रहेगा
प्यार
करेगा
बस
तुमको
मुझको
पागल
कह
देती
थी
उसको
पागल
मत
कहना
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Tanoj Dadhich
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आख़िरी
जंग
मैं
लड़ने
के
लिए
निकला
हूँ
फिर
रहे
या
न
रहे
तेरा
दिवाना
आना
Mubarak Siddiqi
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दीवारों
से
मिल
कर
रोना
अच्छा
लगता
है
हम
भी
पागल
हो
जाएँगे
ऐसा
लगता
है
Qaisar-ul-Jafri
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मैं
होश-मंद
हूँ
ख़ुद
भी
सो
मेरी
ग़ज़लों
में
न
रक़्स
करता
है
'आशिक़
न
बाल
खींचता
है
Charagh Sharma
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ख़ातिर
हाज़िर
था
खूंँ
का
हर
कतरा
जिसके
वो
जो
दामन
को
खूँ
से
धोने
वाले
थे
Jitendra "jeet"
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टूट
कर
दर-बदर
हो
गया
एक
दिन
मैं
पुराना
शजर
हो
गया
एक
दिन
तू
अभी
तो
नहीं
है
मगर
क्या
पता
बे-वफ़ा
तू
भी
गर
हो
गया
एक
दिन
जानता
ही
न
था
कोई
कल
तक
मुझे
सुर्ख़ियों
की
ख़बर
हो
गया
एक
दिन
मैं
किनारे
खड़ा
जीत
की
आस
में
फिर
इधर
से
उधर
हो
गया
एक
दिन
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Jitendra "jeet"
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सबको
जीने
का
यूँँ
ढब
नहीं
आएगा
आना
जब
चाहिए
तब
नहीं
आएगा
व्यर्थ
ही
जाएगा
राह
तकना
तेरा
जो
गया
सो
गया
अब
नहीं
आएगा
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Jitendra "jeet"
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एक
सरिता
ने
आश्रय
था
माँगा
मगर
हम
तो
शिव
भी
नहीं
जो
जटा
दे
सकें
हम
स्वयं
ही
तो
कानन
में
विचरण
करें
कोई
घर
हो
तो
उसका
पता
दे
सकें
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Jitendra "jeet"
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मुझ
सेे
अक्सर
जो
बहने
की
कहता
रहता
है
इन
आँखों
के
नीचे
कोई
दरिया
रहता
है
तुमने
कैसे
सोच
लिया
महफ़िल
में
तन्हा
हूँ
साथ
हमारे
यादों
का
इक
पहरा
रहता
है
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Jitendra "jeet"
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