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Jayant Parmar
khunti pe latke ik lamp ki
khunti pe latke ik lamp ki | खूँटी पे लटके इक लैम्प की
- Jayant Parmar
खूँटी
पे
लटके
इक
लैम्प
की
पीली
पीली
रौशनी
में
थकी
थकी
सी
शाम
की
पीठ
दीवारों
पर
धुएँ
के
बादल
की
परतें
कमरे
में
लकड़ी
का
टूटा-फूटा
टेबल
और
पुरानी
चार
कुर्सियाँ
टेबल
पर
मिट्टी
की
प्लेट
में
उबले
आलू
की
ख़ुश्बू
आलू
की
ख़ुश्बू
में
भीगा
कोमल
हाथ
और
मिरी
दोनों
आँखें
भी
ज़ाइक़ा
लेती
हैं
आलू
का
रंगों
में
- Jayant Parmar
कैसी
बिपता
पाल
रखी
है
क़ुर्बत
की
और
दूरी
की
ख़ुशबू
मार
रही
है
मुझ
को
अपनी
ही
कस्तूरी
की
Naeem Sarmad
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फूल
कर
ले
निबाह
काँटों
से
आदमी
ही
न
आदमी
से
मिले
Khumar Barabankvi
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वो
सिर्फ़
फूल
नहीं
ख़ुद
में
ही
क्यारी
था
हमारा
शे'र
तुम्हारी
ग़ज़ल
पे
भारी
था
सब
उसके
चाहने
वाले
सलाम
करते
थे
मैं
उस
हसीन
का
सब
सेे
बड़ा
पुजारी
था
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Vishnu virat
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इन
हवाओं
में
ज़रा
सी
ख़ुशबू
हज़रत
घोलिए
थोड़ी
हिंदी
थोड़ी
सी
उर्दू
यहाँ
पर
बोलिए
Navneet krishna
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मैं
बाग़
में
जिस
जगह
खड़ा
हूँ
हर
फूल
से
काम
चल
रहा
है
Shaheen Abbas
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छुआ
है
तुमने
भी
इक
रोज़
हमको
ये
ख़ुशबू
देर
तक
महका
करेगी
तुम्हारे
हाथ
सालों
तक
ये
दुनिया
हमारे
नाम
पे
चूमा
करेगी
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Ritesh Rajwada
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तेरा
रुख़सत
होना
अब
भी
बाक़ी
है
तेरी
ख़ुशबू
परछाईं
से
आती
है
Gopesh "Tanha"
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न
उन
लबों
पे
तबस्सुम
न
फूल
शाख़ों
पर
गुज़र
गए
हैं
जो
मौसम
गुज़रने
वाले
थे
Kaif Uddin Khan
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अपने
होंटों
से
कहो
फूल
को
चू
में
हर
रोज़
जब
मेरे
लब
नहीं
होंगे
तो
सहूलत
होगी
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Shahbaz Rizvi
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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