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Javed Akhtar
aap bhi aaiye ham ko bhi bulaate rahiye
aap bhi aaiye ham ko bhi bulaate rahiye | आप भी आइए, हम को भी बुलाते रहिए
- Javed Akhtar
आप
भी
आइए,
हम
को
भी
बुलाते
रहिए
दोस्ती
जुर्म
नहीं,
दोस्त
बनाते
रहिए
ज़हर
पी
जाइए
और
बाँटिए
अमृत
सबको
ज़ख्म
भी
खाइए
और
गीत
भी
गाते
रहिए
वक़्त
ने
लूट
लीं
लोगों
की
तमन्नाएँ
भी
ख़्वाब
जो
देखिए
औरों
को
दिखाते
रहिए
शक्ल
तो
आपके
भी
ज़ेहन
में
होगी
कोई
कभी
बन
जाएगी
तस्वीर,
बनाते
रहिए
- Javed Akhtar
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मैं
दिल
को
सख़्त
करके
उस
गली
जा
तो
रहा
हूँ
दोस्त
करूँँगा
क्या
अगर
वो
ही
शरारत
पर
उतर
आया
Harsh saxena
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दिन
सलीक़े
से
उगा
रात
ठिकाने
से
रही
दोस्ती
अपनी
भी
कुछ
रोज़
ज़माने
से
रही
Nida Fazli
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और
फिर
लोग
यही
कहते
फिरेंगे
इक
दिन
यार
कल
ही
तो
मेरी
बात
हुई
थी
उस
सेे
Saad Ahmad
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मिले
किसी
से
गिरे
जिस
भी
जाल
पर
मेरे
दोस्त
मैं
उसको
छोड़
चुका
उसके
हाल
पर
मेरे
दोस्त
ज़मीं
पे
सबका
मुक़द्दर
तो
मेरे
जैसा
नहीं
किसी
के
साथ
तो
होगा
वो
कॉल
पर
मेरे
दोस्त
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Ali Zaryoun
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यार
बिछड़कर
तुमने
हँसता
बसता
घर
वीरान
किया
मुझको
भी
आबाद
न
रक्खा
अपना
भी
नुक़्सान
किया
Ali Zaryoun
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कोई
दिक़्क़त
नहीं
है
गर
तुम्हें
उलझा
सा
लगता
हूँ
मैं
पहली
मर्तबा
मिलने
में
सबको
ऐसा
लगता
हूँ
ज़रूरी
तो
नहीं
हम
साथ
हैं
तो
कोई
चक्कर
हो
वो
मेरी
दोस्त
है
और
मैं
उसे
बस
अच्छा
लगता
हूँ
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Ali Zaryoun
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कौन
रोता
है
किसी
और
की
ख़ातिर
ऐ
दोस्त
सब
को
अपनी
ही
किसी
बात
पे
रोना
आया
Sahir Ludhianvi
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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एक
ही
नदी
के
हैं
ये
दो
किनारे
दोस्तो
दोस्ताना
ज़िंदगी
से
मौत
से
यारी
रखो
Rahat Indori
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फिर
ख़मोशी
ने
साज़
छेड़ा
है
फिर
ख़यालात
ने
ली
अँगड़ाई
Javed Akhtar
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ज़रा
मौसम
तो
बदला
है
मगर
पेड़ों
की
शाख़ों
पर
नए
पत्तों
के
आने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
बहुत
से
ज़र्द
चेहरों
पर
ग़ुबार-ए-ग़म
है
कम
बे-शक
पर
उन
को
मुस्कुराने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
Javed Akhtar
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तमन्ना
फिर
मचल
जाए
अगर
तुम
मिलने
आ
जाओ
ये
मौसम
भी
बदल
जाए
अगर
तुम
मिलने
आ
जाओ
मुझे
ग़म
है
कि
मैं
ने
ज़िंदगी
में
कुछ
नहीं
पाया
ये
ग़म
दिल
से
निकल
जाए
अगर
तुम
मिलने
आ
जाओ
ये
दुनिया-भर
के
झगड़े
घर
के
क़िस्से
काम
की
बातें
बला
हर
एक
टल
जाए
अगर
तुम
मिलने
आ
जाओ
नहीं
मिलते
हो
मुझ
से
तुम
तो
सब
हमदर्द
हैं
मेरे
ज़माना
मुझ
से
जल
जाए
अगर
तुम
मिलने
आ
जाओ
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Javed Akhtar
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मुझे
दुश्मन
से
भी
ख़ुद्दारी
की
उम्मीद
रहती
है
किसी
का
भी
हो
सर
क़दमों
में
सर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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शुक्र
है
ख़ैरियत
से
हूँ
साहब
आप
से
और
क्या
कहूँ
साहब
अब
समझने
लगा
हूँ
सूद-ओ-ज़ियाँ
अब
कहाँ
मुझ
में
वो
जुनूँ
साहब
ज़िल्लत-ए-ज़ीस्त
या
शिकस्त-ए-ज़मीर
ये
सहूँ
मैं
कि
वो
सहूँ
साहब
हम
तुम्हें
याद
करते
रो
लेते
दो-घड़ी
मिलता
जो
सुकूँ
साहब
शाम
भी
ढल
रही
है
घर
भी
है
दूर
कितनी
देर
और
मैं
रुकूँ
साहब
अब
झुकूँगा
तो
टूट
जाऊँगा
कैसे
अब
और
मैं
झुकूँ
साहब
कुछ
रिवायात
की
गवाही
पर
कितना
जुर्माना
मैं
भरूँ
साहब
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Javed Akhtar
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