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SAAGAR SINGH RAJPUT
kal tak jinko sab dikhta tha
kal tak jinko sab dikhta tha | कल तक जिनको सब दिखता था
- SAAGAR SINGH RAJPUT
कल
तक
जिनको
सब
दिखता
था
वो
सब
शायद
अब
अंधे
हैं
- SAAGAR SINGH RAJPUT
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पेड़
जो
कल
के
उगे
हैं
छाँव
मुझको
दे
रहे
हैं
साथ
तो
देते
नहीं
पर
लोग
ताने
मारते
हैं
मैं
नहीं
कुछ
बोलता
अब
शे'र
मेरे
बोलते
हैं
जान
मेरे
पास
आओ
आज
बच्चे
सो
रहे
हैं
बस
नज़र
आता
है
पंखा
हौसले
जब
टूटते
हैं
पैर
जो
छूते
हैं
यारो
वो
गला
भी
काटते
हैं
किस
लिए
सागर
दुखी
हो
दर्द
मुझ
सेे
पूछते
हैं
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मुहब्बत
है
अगर
करनी
तो
पागल
यार
हो
जाओ
भरे
सावन
का
आवारा
सा
बादल
यार
हो
जाओ
भले
ही
दिल
लिए
पत्थर
का
फिरते
हो
ज़माने
में
मगर
माशूक़
की
नज़रों
से
घाइल
यार
हो
जाओ
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कह
रहे
हैं
सभी
मैं
सलामत
रहूँ
ओह
हाँ
आज
मेरा
जनम
दिन
जो
है
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अब
नींद
मुझको
आती
नहीं
है
मैं
आशिक़ी
में
जगने
लगा
हूँ
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इश्क़
में
अश्क
बहा
के
रोए
ख़्वाबों
में
घबरा
के
रोए
जब
भी
ख़ुद
को
तन्हा
पाया
यारो
हम
चिल्ला
के
रोए
उस
की
याद
हमें
जब
आई
संग
से
सर
टकरा
के
रोए
उस
को
याद
नहीं
करना
अब
दिल
को
ये
समझा
के
रोए
रोते
मर्द
बुरे
लगते
हैं
सो
हम
अश्क
छुपा
के
रोए
इश्क़
से
हम
कर
लेंगे
तौबा
ऐसी
क़स
में
खा
के
रोए
दर्द
बढ़ा
जब
हद
से
ज़्यादा
रब
को
दर्द
बता
के
रोए
इश्क़
बुरा
है
तुम
मत
करना
सब
को
हम
समझा
के
रोए
सागर
से
ले
ले
कर
आँसू
सहरा
में
जा
जा
के
रोए
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