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Dhirendra Pratap Singh
khwahishon ka gala daba lete
khwahishon ka gala daba lete | ख़्वाहिशों का गला दबा लेते
- Dhirendra Pratap Singh
ख़्वाहिशों
का
गला
दबा
लेते
फिर
मेरी
तरह
मुस्कुरा
लेते
दोस्ती
प्यार
में
बदल
जाती
थोड़ी
हिम्मत
अगर
जुटा
लेते
कैसा
है
स्वाद
बे-वफ़ाई
का
गर
चखे
होते
तो
बता
लेते
ना-ख़ुदा
ये
तुम्हारे
हाथ
में
था
डूबती
कश्ती
को
बचा
लेते
रात
यूँँ
आँख
में
सुलगती
न
तो
एक
कश
नींद
का
लगा
लेते
सर्द
मौसम
पुराने
गाने
चाय
दोस्त
सिगरेट
भी
इक
जला
लेते
मन
का
रुक
जाता
गर
महाभारत
हम
भी
फिर
बाँसुरी
बजा
लेते
- Dhirendra Pratap Singh
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मेरी
तस्वीर
और
भी
अच्छी
आएगी
लगा
कर
देखो
ना
फ़िल्टर
उदासी
का
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गाँव
छोड़ने
की
बददुआ
मुझे
भी
लग
गई
यार
तेरे
शहर
की
हवा
मुझे
भी
लग
गई
मैंने
घर
बना
लिया
इक
अजनबी
से
शहर
में
यानी
उम्र-क़ैद
की
सज़ा
मुझे
भी
लग
गई
लोगों
की
ज़बान
पर
मेरा
भी
शे'र
आ
गया
दोस्तों
बुज़ुर्गों
की
दु'आ
मुझे
भी
लग
गई
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उसने
भी
रक्खा
ऑप्शन
की
तरह
जिसकी
प्रायोरिटी
था
बनना
हमें
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और
तो
कुछ
भी
नहीं
होता
किसी
के
जाने
से
यार
आँखें
रोना
सीख
लेतीं
होंठ
हँसना
भूल
जाते
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कि
राधा
बन
गई
तुम
भी
कन्हैया
बन
गया
मैं
भी
अभागी
बन
गई
तुम
भी
अभागा
बन
गया
मैं
भी
निगोड़े
इश्क़
ने
हमको
कहीं
का
भी
नहीं
छोड़ा
तमाशा
बन
गई
तुम
भी
तमाशा
बन
गया
मैं
भी
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