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Haidar Bayabani
garmi ka hai zamaana
garmi ka hai zamaana | गर्मी का है ज़माना
- Haidar Bayabani
गर्मी
का
है
ज़माना
सर्दी
हुई
रवाना
आँखें
दिखाए
सूरज
तन-मन
जलाए
सूरज
पानी
हवा
हुआ
है
जंगल
जला
हुआ
है
होती
है
साएँ
साएँ
ग़ुस्से
में
हैं
हवाएँ
उठते
हैं
यूँँ
बगूले
जैसे
गगन
को
छू
ले
तीतर
बटेर
तोते
खाएँ
हवा
में
ग़ोते
धरती
दहक
रही
है
मिट्टी
सुलग
रही
है
गिर
जाए
जो
ज़मीं
पर
भुन
जाए
है
वो
दाना
गर्मी
का
है
ज़माना
सर्दी
हुई
रवाना
मौसम
बदल
रहा
है
इंसाँ
पिघल
रहा
है
उतरा
गले
से
मफ़लर
मुँह
तक
रही
है
चादर
तह
हो
गई
रज़ाई
ख़ाली
है
चारपाई
कम्बल
सहज
रखी
है
मलमल
गले
लगी
है
पंखों
को
झल
रहे
हैं
अब
फ़ैन
चल
रहे
हैं
हीटर
से
ख़ौफ़
खाएँ
कूलर
चलाए
जाएँ
हर
शय
बदल
रही
है
क्या
मर्द
क्या
ज़नाना
गर्मी
का
है
ज़माना
सर्दी
हुई
रवाना
आती
है
याद
नानी
करते
हैं
पानी
पानी
शर्बत
का
दौर
आए
क़ुलफ़ी
दिलों
को
भाए
तरबूज़
बिक
रहे
हैं
खरबूज़
बिक
रहे
हैं
दूकान
कोई
खोले
बेचे
हैं
बर्फ़-गोले
घर
घर
में
हम
ने
देखा
पीते
हैं
रूह-अफ़्ज़ा
लस्सी
का
बोल-बाला
काफ़ी
का
मुँह
है
काला
जिस
से
मिले
है
ठंडक
उस
का
जहाँ
दिवाना
गर्मी
का
है
ज़माना
सर्दी
हुई
रवाना
- Haidar Bayabani
ज़रा
मौसम
तो
बदला
है
मगर
पेड़ों
की
शाख़ों
पर
नए
पत्तों
के
आने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
बहुत
से
ज़र्द
चेहरों
पर
ग़ुबार-ए-ग़म
है
कम
बे-शक
पर
उन
को
मुस्कुराने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
Javed Akhtar
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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मैं
पहले
हारी
थी
इस
बार
हारने
की
नहीं
तू
जा
रहा
है
तो
जा
मैं
पुकारने
की
नहीं
मुझे
पहाड़ों
पे
मौसम
का
लुत्फ़
लेना
है
मैं
तेरे
कमरे
में
सर्दी
गुज़ारने
की
नहीं
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Mumtaz Naseem
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मेरी
आँखों
से
बारिश
पूछती
है
तुम्हारा
क्या
कोई
मौसम
नहीं
है
100rav
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करती
है
तो
करने
दे
हवाओं
को
शरारत
मौसम
का
तकाज़ा
है
कि
बालों
को
खुला
छोड़
Abrar Kashif
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जिस
मौसम
में
भीगना
है
हम
दोनों
को
उस
मौसम
में
पूछ
रही
हो
छाता
है
Zubair Alam
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बदल
गए
मेरे
मौसम
तो
यार
अब
आए
ग़मों
ने
चाट
लिया
ग़म-गुसार
अब
आए
Farhat Abbas Shah
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हमेशा
यही
भूल
करता
रहा
तेरा
साथ
पाने
को
मरता
रहा
सुनहरे
बहारों
के
मौसम
तले
गुलिस्ताँ
हमारा
बिखरता
रहा
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Ambar
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