deep jis ka mahallaat hi men jale | दीप जिस का महल्लात ही में जले

  - Habib Jalib
दीपजिसकामहल्लातहीमेंजले
चंदलोगोंकीख़ुशियोंकोलेकरचले
वोजोसाएमेंहरमस्लहतकेपले
ऐसेदस्तूरकोसुब्ह-ए-बे-नूरको
मैंनहींमानतामैंनहींजानता
मैंभीख़ाइफ़नहींतख़्ता-ए-दारसे
मैंभीमंसूरहूँकहदोअग़्यारसे
क्यूँँडरातेहोज़िंदाँकीदीवारसे
ज़ुल्मकीबातकोजहलकीरातको
मैंनहींमानतामैंनहींजानता
फूलशाख़ोंपेखिलनेलगेतुमकहो
जामरिंदोंकोमिलनेलगेतुमकहो
चाकसीनोंकेसिलनेलगेतुमकहो
इसखुलेझूटकोज़ेहनकीलूटको
मैंनहींमानतामैंनहींजानता
तुमनेलूटाहैसदियोंहमारासुकूँ
अबहमपरचलेगातुम्हाराफ़ुसूँ
चारा-गरदर्दमंदोंकेबनतेहोक्यूँँ
तुमनहींचारा-गरकोईमानेमगर
मैंनहींमानतामैंनहींजानता
  - Habib Jalib
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