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H. B. Baloch
raat ke lambe saa.e
raat ke lambe saa.e | रात के लम्बे साए
- H. B. Baloch
रात
के
लम्बे
साए
पैरों
से
आ
लिपटते
हैं
ऐ
मेरे
हम-सफ़र
हमा-तन-गोश
रहना
रक़्स
से
ज़रा
देर
पहले
गर्म
ख़ून
की
लौ
नाचती
है
और
बेताबी
हमेशा
चाँद
को
पाँव
लगा
देती
है
हम
किसी
दिन
या
सूरज
की
बात
नहीं
कर
रहे
क्या
तुम्हें
पता
नहीं
ख़्वाब
और
कोंपलें
रात
को
उगती
हैं
और
दिन
में
काटी
जाती
हैं
- H. B. Baloch
फेंक
कर
रात
को
दीवार
पे
मारे
होते
मेरे
हाथों
में
अगर
चाँद
सितारे
होते
Unknown
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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रात
बाक़ी
थी
जब
वो
बिछड़े
थे
कट
गई
उम्र
रात
बाक़ी
है
Khumar Barabankvi
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रात
आ
कर
गुज़र
भी
जाती
है
इक
हमारी
सहर
नहीं
होती
Ibn E Insha
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ये
हवा
सारे
चराग़ों
को
उड़ा
ले
जाएगी
रात
ढलने
तक
यहाँ
सब
कुछ
धुआँ
हो
जाएगा
Naseer Turabi
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दूर
रह
कर
न
करो
बात
क़रीब
आ
जाओ
याद
रह
जाएगी
ये
रात
क़रीब
आ
जाओ
Sahir Ludhianvi
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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अभी
हमको
मुनासिब
आप
होते
से
नहीं
लगते
ब–चश्म–ए–तर
मुख़ातिब
हैं
प
रोते
से
नहीं
लगते
वही
दर्या
बहुत
गहरा
वही
तैराक
हम
अच्छे
हुआ
है
दफ़्न
मोती
अब
कि
गोते
से
नहीं
लगते
ये
आई
रात
आँखों
को
चलो
खूँ–खूँ
किया
जाए
बदन
ये
सो
भी
जाए
आँख
सोते
से
नहीं
लगते
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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मौत
का
एक
दिन
मुअय्यन
है
नींद
क्यूँँ
रात
भर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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