khulii kitaab ke safhe ultate rahte hain | खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं

  - Gulzar
खुलीकिताबकेसफ़्हेउलटतेरहतेहैं
हवाचलेचलेदिनपलटतेरहतेहैं
बसएकवहशत-ए-मंज़िलहैऔरकुछभीनहीं
किचंदसीढ़ियाँचढ़तेउतरतेरहतेहैं
मुझेतोरोज़कसौटीपेदर्दकसताहै
किजाँसेजिस्मकेबख़ियेउधड़तेरहतेहैं
कभीरुकानहींकोईमक़ाम-ए-सहरामें
किटीलेपाँव-तलेसेसरकतेरहतेहैं
येरोटियाँहैंयेसिक्केहैंऔरदाएरेहैं
येएकदूजेकोदिनभरपकड़तेरहतेहैं
भरेहैंरातकेरेज़ेकुछऐसेआँखोंमें
उजालाहोतोहमआँखेंझपकतेरहतेहैं
  - Gulzar
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